जब पत्रकारिता व्रत थी, व्यवसाय नहीं: उदन्त मार्तण्ड की प्रेरक गाथा

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विख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था, “आने वाली पीढ़ियाँ मुश्किल से इस बात पर विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस का बना ऐसा कोई व्यक्ति कभी इस धरती पर चला था।”

आइंस्टीन की यह अवधारणा हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर भी सटीक बैठती है। नई पीढ़ी के लिए यह विश्वास करना कठिन है कि त्याग, तपस्या और बलिदान की जिस परंपरा पर हिंदी पत्रकारिता विकसित हुई, वह कितनी समृद्ध और प्रेरणादायक रही है।

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हिंदी के प्रथम समाचार-पत्र उदन्त मार्तण्ड, जिसका प्रथम अंक 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ था, की दूसरी शताब्दी के अवसर पर उसके इतिहास का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि हिंदी पत्रकारिता में तेजस्वी, समर्पित और साधक संपादकों की गौरवशाली परंपरा रही है।

एक जेब में पिस्तौल और दूसरी में हस्तलिखित क्रांतिकारी पत्र रणभेरी की प्रतियाँ लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर, दंगों में प्राण गंवाने वाले प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी तथा कलकत्ता में सेठ-साहूकारों की गद्दियों पर जाकर स्वयं अपना समाचार-पत्र पढ़कर सुनाने वाले बाल मुकुंद गुप्त जैसे संपादकों के त्याग और बलिदान पर नई पीढ़ी का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। पत्रकारिता को ‘वृत्ति’ नहीं, बल्कि ‘व्रत’ मानकर जीवन समर्पित करने वाले ऐसे पत्रकारों की कल्पना आज कठिन प्रतीत होती है।

उस समय न तो प्रौद्योगिकी विकसित थी और न ही समाचार-पत्रों का प्रकाशन किसी उद्योग या व्यापार के रूप में देखा जाता था। संपादक, स्वामी और पत्रकार की अनेक भूमिकाएँ एक ही व्यक्ति निभाता था। ऐसे ही कठिन और जोखिम भरे दौर में उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन हुआ, जिसने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। आज भी मीडिया को उन मूल्यों की आवश्यकता है जिन्हें उदन्त मार्तण्ड जैसे समाचार-पत्रों ने स्थापित किया था।

कानपुर सदर दीवानी अदालत में वकालत करने वाले पंडित युगल किशोर शुक्ल दृढ़ इच्छाशक्ति और अदम्य साहस के साथ समाचार-पत्र प्रकाशित करने का संकल्प लेकर लगभग एक हजार किलोमीटर दूर कलकत्ता पहुँचे।

उस समय मुद्रण का प्रमुख केंद्र कलकत्ता था। अपनी सीमित पूँजी और उधार की थोड़ी धनराशि के साथ उन्होंने गवर्नर जनरल के समक्ष हिंदी में साप्ताहिक समाचार-पत्र प्रकाशित करने की अनुमति के लिए आवेदन किया। 19 फरवरी 1826 को अनुमति मिलने के बाद 30 मई 1826 को उन्होंने उदन्त मार्तण्ड का प्रथम अंक प्रकाशित किया और यह तिथि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अमर हो गई।

कलकत्ता की आमड़ातल्ला गली, कोल्हूटोला से प्रकाशित यह पत्र शीघ्र ही पाठकों में लोकप्रिय हो गया। इसका वार्षिक मूल्य दो रुपये निर्धारित किया गया था। प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होने वाले इस समाचार-पत्र में देश-विदेश के समाचार, घटनाएँ, दुर्घटनाएँ, आयोजन, सरकारी सूचनाएँ, विज्ञापन, जलयान की समय-सारिणी, साहित्य, व्यापारिक समाचार, सामयिक विषय, बाजार भाव, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के स्थानांतरण तथा धार्मिक और नैतिक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किए जाते थे।

पंडित युगल किशोर शुक्ल ने लिखा था कि हिंदुस्तानी लोग विभिन्न देशों के सत्य समाचार देखकर, पढ़कर और समझ सकें, इसी उद्देश्य से इस नए प्रयास की शुरुआत की गई। उदन्त मार्तण्ड का ध्येय वाक्य था “हिन्दुस्तानियों के हित हेत”। सत्य इसकी आत्मा था और आज भी पत्रकारिता का मूल आधार सत्य ही है।

उदन्त मार्तण्ड की भाषा तत्कालीन प्रचलित हिंदी से कुछ भिन्न थी। इसमें ब्रजभाषा और अवधी का प्रयोग प्रमुख रूप से किया गया था। साथ ही अरबी, फारसी और अन्य प्रचलित शब्दों, मुहावरों और कहावतों का भी उपयोग हुआ। भाषा की शुद्धता के साथ-साथ जनभाषा के निकट रहने का प्रयास इसकी विशेषता थी।

यह अल्पजीवी समाचार-पत्र 4 दिसंबर 1827 को अपने अंतिम अंक के साथ बंद हो गया। विज्ञापनों की कमी और डाक-व्यय में किसी प्रकार की सरकारी सुविधा न मिलने के कारण इसका प्रकाशन जारी नहीं रह सका। मात्र अठारह महीनों में प्रकाशित इसके कुल 79 अंक हिंदी पत्रकारिता की अमूल्य धरोहर हैं, जिनमें से कुछ अंक आज भी कोलकाता स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित हैं।

हिंदी को पत्रकारिता और जनसंचार की भाषा बनाकर लोकशिक्षा, लोकचेतना, जनजागरण और स्वाधीनता के संकल्प का माध्यम बनाने वाला उदन्त मार्तण्ड केवल एक समाचार-पत्र नहीं था, बल्कि एक क्रांतिकारी और युगप्रवर्तक प्रयास था। उस समय हिंदी में कोई समाचार-पत्र नहीं था और अन्य भाषाओं के पत्र आम जनता तक नहीं पहुँच पाते थे। ऐसे में उदन्त मार्तण्ड ने हिंदी पाठकों की एक बड़ी आवश्यकता पूरी की।

‘उदन्त मार्तण्ड’ का अर्थ है उगता हुआ सूर्य। एक अन्य अर्थ में ‘उदन्त’ यानी समाचार और ‘मार्तण्ड’ यानी सूर्य, अर्थात् समाचार रूपी सूर्य।

दो सौ वर्ष बाद भी उदन्त मार्तण्ड का स्मरण प्रेरणादायी है। यह हमें याद दिलाता है कि साधन और तकनीक बदल सकते हैं, लेकिन निष्पक्षता, जनसरोकार, लोकहित और भाषा की गरिमा जैसे मूल्य कभी पुराने नहीं होते। पत्रकारिता के विशाल सागर में जब-जब दिशा का संकट उत्पन्न होगा, तब-तब उदन्त मार्तण्ड जैसी ऐतिहासिक धरोहर दीपस्तंभ की तरह सही मार्ग दिखाएगी।

कुछ ही समय में यह समाचार-पत्र अंग्रेजी शासन और प्रशासन की आँखों में खटकने लगा। इसे बचाने के लिए हिंदी प्रेमियों से सहयोग की अपील की गई, किंतु अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी और हिंदी पत्रकारिता का यह ऐतिहासिक उपक्रम इतिहास का हिस्सा बन गया।

इसके अंतिम अंक में पंडित युगल किशोर शुक्ल ने जो पीड़ा व्यक्त की, वह आज भी मन को उद्वेलित करती है “आज दिवस लौं उग चुक्यो यह मार्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन को अन्त।”

हिंदी संस्थाओं, विश्वविद्यालयों तथा राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा यदि उदन्त मार्तण्ड पर व्यापक अनुसंधान कराया जाए, तो इसके ऐतिहासिक योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना इसकी दूसरी शताब्दी का सबसे सार्थक सम्मान होगा।

लेखक: राम मोहन पाठक, पूर्व कुलपति एवं शिक्षाविद ✍️

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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