
नाग पंचमी के पावन अवसर पर आज कुमाऊं की धरती अपनी सदियों पुरानी लोकपरंपराओं और आस्था के रंग में रंग उठेगी।
एक ओर नाग देवता की पूजा-अर्चना होगी, तो दूसरी ओर घर-आंगन में घी संक्रांति यानी घी त्यार और बिरुड़ पंचमी की परंपराएं जीवंत होंगी। भीगे हुए पांच या सात अनाजों से तैयार बिरुड़े केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सुख-समृद्धि, आरोग्य और परिवार की खुशहाली की कामना का प्रतीक हैं।
खेतों में लहलहाती फसल, रसोई में घी की खुशबू और अपनों के लिए स्नेह से भेजे जाने वाले ‘ओलग’ के साथ यह पर्व कुमाऊं की उस आत्मीय संस्कृति की याद दिलाता है, जहां त्योहार सिर्फ मनाए नहीं जाते, बल्कि पीढ़ियों से रिश्तों और मिट्टी से जोड़कर रखे जाते हैं।
आज नाग पंचमी के साथ-साथ कुमाऊँनी लोक पर्व घी संक्रांति (घ्यूँ त्यार / ओलगिया) विरुड पंचमी पर्व मनाया जाएगा।
बिरुड़ पंचमी पर पांच/सात अनाजों को भिगोकर अंकुरित ‘बिरुड़े’ तैयार किए जाते हैं। तदोपरांत सातों-आठों/(गौरा-महेशपूजन) के दिन इन्हें देव पूजन के बाद सुख-समृद्धि और आरोग्य के आशीर्वाद रूप में सिर पर चढ़ाया जाता है।
‘देवभूमि’ उत्तराखंड केवल अपनी अलौकिक पावनता और ऋषि-मुनियों की तपोस्थली के रूप में ही नहीं, अपितु यहाँ की सदियों पुरानी परंपराओं के कारण भी अनूठी है। यहाँ का हर पर्व अद्भुत वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रकृति के संतुलन, मानव स्वास्थ्य और वैदिक आयुर्वेद का एक सुंदर समावेश है।
माटी की खुशबू, फसलों की हरियाली और लोक-विश्वास का यही सजीव उदाहरण है घी संक्रांति (घी त्यार)। जिस तरह हरेला बीजों को बोने की खुशी का प्रतीक है, उसी तरह घी त्यार खेतों में लहलहाती बालियों के स्वागत का पावन उत्सव है।
घी संक्रांति (घी त्यार) का महत्व और पौराणिक विधान
सूर्य देव का पूजन व संक्रांति
चूंकि सूर्य देव सभी ग्रहों में श्रेष्ठ (राजा) है इस दिन अपनी स्व राशि सिंह राशि में प्रवेश करते हैं इसलिए भी सिंह संक्रांति का यह दिन विशेष माना जाता है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात सूर्य देव का पूजन कर फसलों की लहलहाती बालियों का स्वागत किया जाता है।
घी सेवन की अनिवार्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस संक्रांति पर घी का सेवन अनिवार्य माना गया है। लोक-विश्वास है कि जो इस दिन घी नहीं खाता, उसे अगले जन्म में घोंगा (घोंघे का जीव) बनना पड़ता है।
शिशुओं का स्वास्थ्य संरक्षण
घर के नवजात बच्चों और छोटे शिशुओं के सिर के तालु और तलवों पर शुद्ध देसी घी लगाया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी और आरोग्यदायी होता है।
वैज्ञानिक व आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
वर्षा काल में पशुओं को हरी-भरी ताज़ी घास मिलने से दूध-घी की प्रचुरता रहती है। आयुर्वेद के अनुसार इस मौसम में देसी घी का सेवन शरीर को नई ऊर्जा, ओज और बल प्रदान करता है।
पारंपरिक व्यंजन और सुंदर ‘ओलग’ (उपहार) संस्कार
स्वादिष्ट बेड़ू रोटी और गाबे की सब्जी: उड़द दाल की मसालेदार पिट्ठी से भरी बेड़ू रोटी और मौसमी अरबी (पिंनालू) के पत्तों व गाबों की सब्जी बनाई जाती है, जिसे शुद्ध देसी घी में डुबोकर खाया जाता है।
ओलग (उपहार) की पावन रीत
घी संक्रान्ति के दिन खेतों की पहली नई उपज (ताज़ी हरी सब्जियां, फल) और धिनाली (दूध, दही, घी) अपनी शादीशुदा बेटियों-बहनों, सम्बन्धियों, बड़ों ‘ओलग’ (उपहार) के रूप में भेंट कर आशीर्वाद लेने की परंपरा है।
अपनी वैज्ञानिक व समृद्ध लोक संस्कृति को संजोएं, आज के परिवेश में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहें और इस अनमोल धरोहर की जानकारी को जन-जन तक पहुंचाएं और अपनी संस्कृति का संरक्षण करें।









