चिंतन: रील्स के दौर में खोता बचपन!

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फ्रांस की संसद ने 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर रोक लगाने की दिशा में जो कदम उठाया है, वह केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। यह संदेश है कि तकनीक की अंधी दौड़ में कहीं हम अपने बच्चों का बचपन तो नहीं खो रहे।

आज का बचपन पहले जैसा नहीं रहा। कभी शाम होते ही बच्चों की किलकारियों से गूंजने वाले मैदान अब सूने हैं। उनकी जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। खेल, किताबें, परिवार और दोस्तों के बीच बीतने वाला समय अब रील्स, शॉर्ट वीडियो और अंतहीन स्क्रॉलिंग में सिमटता जा रहा है। यह बदलाव सिर्फ आदतों का नहीं, बल्कि सोच, व्यवहार और व्यक्तित्व का भी है।

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दुनियाभर के शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों और किशोरों में अवसाद, चिंता, अनिद्रा, आत्मविश्वास में कमी, ध्यान भटकने और साइबर बुलिंग जैसी समस्याओं को बढ़ा रहा है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस तरह बनाए गए हैं कि उपयोगकर्ता अधिक से अधिक समय तक स्क्रीन से जुड़ा रहे। सबसे अधिक असर उसी उम्र पर पड़ता है, जब बच्चों का मस्तिष्क, भावनाएं और निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो रही होती है।

भारत जैसे देश में यह चिंता और गंभीर है। करोड़ों बच्चे कम उम्र में ही स्मार्टफोन की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं। ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल सेवाओं ने इंटरनेट को जरूरत बना दिया है, लेकिन डिजिटल अनुशासन सिखाने की हमारी तैयारी उतनी मजबूत नहीं है। नतीजा यह है कि बच्चे ऐसी आभासी दुनिया में बड़े हो रहे हैं, जहां वास्तविक रिश्तों की जगह वर्चुअल लाइक्स और फॉलोअर्स लेते जा रहे हैं।

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सोशल मीडिया पूरी तरह नुकसानदेह है। ज्ञान, संवाद, रचनात्मकता और नए अवसरों का यह बड़ा माध्यम भी है। समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित उपयोग है। इसलिए केवल प्रतिबंध ही समाधान नहीं हो सकता।

परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार चारों को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। सबसे पहले माता-पिता को स्वयं स्क्रीन के प्रति संतुलित व्यवहार अपनाना होगा, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं।

सरकारों को बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करना होगा। प्रभावी आयु सत्यापन, मजबूत साइबर सुरक्षा, डिजिटल साक्षरता और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। तकनीक का उपयोग बच्चों के विकास के लिए होना चाहिए, न कि उनके बचपन की कीमत पर।

आज जरूरत किसी एक कानून से ज्यादा सामूहिक जागरूकता की है। यदि समाज ने समय रहते इस खतरे को नहीं पहचाना, तो आने वाले वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक रिश्तों पर इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे।

बचपन जीवन की सबसे अनमोल पूंजी है। इसे लाइक्स, व्यूज़ और रील्स की भीड़ में खोने नहीं देना चाहिए। क्योंकि बचपन बचेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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