
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। खाड़ी क्षेत्र में ईरान और अमेरिका के मध्य उपजा वर्तमान सैन्य संकट अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उस क्रूर यथार्थ को उजागर करता है, जहाँ शांति की दुहाई तो दी जाती है परंतु आचरण केवल शक्ति के विस्तार का होता है।
मार्च 2026 की यह युद्ध जैसी विभीषिका केवल दो राष्ट्रों का टकराव नहीं, बल्कि एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को जबरन थोपने की अमेरिकी हठधर्मिता का परिणाम है। जब संवाद के तर्कों का स्थान मिसाइलों की गूँज ले लेती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वैश्विक कूटनीति अपने सबसे निम्न स्तर पर पहुँच चुकी है।
अमेरिकी रणनीति का सबसे चिंताजनक पक्ष उसकी वह हस्तक्षेपवादी प्रवृत्ति है, जिसने पूर्व में इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के नाम पर संप्रभुता का जो हनन किया जा रहा है, वह अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र की जड़ों पर प्रहार है।
एक ओर परमाणु अप्रसार के नैतिक उपदेश देना और दूसरी ओर अपनी सैन्य श्रेष्ठता के अहंकार में किसी भी देश की भौगोलिक सीमाओं का उल्लंघन करना, यह अमेरिका के दोहरे चरित्र को परिभाषित करता है।
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो यह सांस्कृतिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद का ही एक आधुनिक स्वरूप है, जहाँ शक्तिशाली राष्ट्र अपनी इच्छा को ही वैश्विक नियम मान लेते हैं।
इस संघर्ष के आर्थिक और मानवीय पक्ष और भी भयावह हैं। होरमुज़ जलडमरूमध्य जैसे वैश्विक व्यापार के प्राण-केंद्र को युद्ध की बलि चढ़ाना एक अदूरदर्शी निर्णय है। इसकी सबसे भारी कीमत उन विकासशील देशों को चुकानी पड़ रही है जिनका इस वैचारिक युद्ध से कोई सीधा सरोकार नहीं है।
ऊर्जा संकट और बढ़ती मुद्रास्फीति ने दुनिया के एक बड़े हिस्से में मानवीय गरिमा को खतरे में डाल दिया है। क्या वाशिंगटन का सत्ता प्रतिष्ठान इस बात का उत्तर दे पाएगा कि उनके भू-राजनीतिक हितों की वेदी पर वैश्विक निर्धनता की बलि क्यों चढ़ाई जा रही है?
अंततः, यह युद्ध यह सिद्ध करता है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं आज केवल शक्ति के केंद्रों की मूक दर्शक बनकर रह गई हैं। शक्ति का यह नग्न संघर्ष यदि इसी प्रकार चलता रहा, तो भविष्य में सभ्यताओं का संवाद केवल एक किताबी आदर्श बनकर रह जाएगा।
समय की मांग है कि वैश्विक समुदाय इस रणनीतिक उन्माद के विरुद्ध एकजुट हो, अन्यथा इतिहास इस कालखंड को एक ऐसी त्रासदी के रूप में याद रखेगा जहाँ एक महाशक्ति के अहंकार ने पूरी मानवता के भविष्य को दांव पर लगा दिया था।
– डॉ. विजय रौतेला की कलम से✍️










