
देवभूमि उत्तराखंड, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और वीर गाथाओं के लिए विश्वविख्यात है, आज एक गंभीर सामाजिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। यह संकट है यहां के युवाओं में बढ़ती ‘दिशाहीनता’। पहाड़ों की शांत वादियों में आज बेरोजगारी, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और पलायन की हताशा ने युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
डॉ. विजय रौतेला ने अपने विचारोत्तेजक लेख के माध्यम से उत्तराखंड के युवाओं की दिशाहीनता जैसे गंभीर विषय को गहरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ उठाया है। उनका विश्लेषण केवल समस्या-चित्रण नहीं, बल्कि समाज और युवाओं के लिए एक स्पष्ट, व्यावहारिक और सकारात्मक दिशा का संकेत है।
दिशाहीनता के प्रमुख कारण: एक विश्लेषण
पलायन और पहचान का संकट: पहाड़ों से रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर पलायन ने युवाओं को अपनी जड़ों से काट दिया है। महानगरों की चकाचौंध और वहां के संघर्ष के बीच युवा अक्सर खुद को अकेला और लक्ष्यहीन महसूस करने लगता है।
नशे का बढ़ता जाल: हाल के वर्षों में उत्तराखंड के शांत क्षेत्रों में ‘ड्रग्स’ और ‘स्मैक’ जैसे घातक नशों ने अपनी पैठ बनाई है। खालीपन और मानसिक तनाव से जूझ रहा युवा क्षणिक सुकून के लिए नशे की शरण ले रहा है, जो उसे पतन की ओर ले जा रहा है।
कौशल विकास बनाम केवल डिग्री: हमारे यहाँ उच्च शिक्षा की डिग्रियां तो हैं, लेकिन बाजार की मांग के अनुरूप ‘कौशल’ का अभाव है। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या और निजी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के कारण युवा बार-बार असफल होने पर मानसिक रूप से टूट जाता है।
सोशल मीडिया और आभासी दुनिया: इंटरनेट के इस दौर में युवा रील और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में खोया हुआ है। वास्तविक श्रम और धरातल की चुनौतियों से दूर भागने की यह प्रवृत्ति उसे कर्महीन बना रही है।
सकारात्मक बदलाव के लिए ‘समाज कार्य’ की भूमिका: युवाओं को इस भंवर से निकालने के लिए केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं हैं, इसके लिए सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे:
स्थानीय संसाधनों का दोहन: युवाओं को यह समझाना होगा कि पहाड़ में केवल समस्याएँ नहीं, बल्कि पर्यटन, जड़ी-बूटी उत्पादन और जैविक खेती जैसे अपार अवसर भी हैं। ‘होमस्टे’ जैसे सफल प्रयोग इसके उदाहरण हैं।
मानसिक स्वास्थ्य और परामर्श: स्कूलों और कॉलेजों में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि ‘करियर काउंसलिंग’ और ‘लाइफ कोचिंग’ अनिवार्य होनी चाहिए। युवाओं को विफलता स्वीकार करना और फिर से खड़ा होना सिखाना होगा।
सांस्कृतिक जुड़ाव: जब युवा अपनी संस्कृति, लोक कला और इतिहास से जुड़ता है, तो उसमें आत्म-सम्मान की भावना जागती है। यह आत्म-सम्मान उसे गलत रास्तों पर जाने से रोकता है।
उत्तराखंड का भविष्य होटलों या सड़कों से नहीं, बल्कि यहाँ के युवाओं की आँखों में पल रहे सपनों से तय होगा। यदि समय रहते हमने युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा, उचित कौशल और संबल प्रदान नहीं किया, तो ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ का हमारे काम न आना केवल एक कहावत बनकर रह जाएगा।
आज आवश्यकता है कि सरकार, समाज और शिक्षक मिलकर युवाओं के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार करें जहाँ वे ‘दिशाहीन’ नहीं, बल्कि ‘दृढ़निश्चयी’ बनें।
(डॉ. विजय रौतेला का विश्लेषण ✍️)









