
देहरादून, प्रेस 15 न्यूज। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की जब भी बात होगी, लोकगायक गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का नाम सबसे सम्मान से लिया जाएगा।
पहाड़ के जनजीवन, उसकी पीड़ा, संघर्ष, प्रकृति, रिश्तों और सामाजिक सरोकारों को अपने गीतों में आवाज देने वाले नेगी आज केवल एक लोकगायक नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के जीवंत प्रतीक बन चुके हैं।
उनके जन्मदिवस पर देहरादून के सोशल बलूनी स्कूल में आयोजित ‘नरेंद्र सिंह नेगी संस्कृति सम्मान समारोह’ में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके योगदान को नमन किया। मुख्यमंत्री ने नेगी के गीतों के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित पुस्तक “Mountain Melodies of Narendra Singh Negi” का विमोचन किया। यह पहल नेगी के गीतों को पहाड़ की सीमाओं से निकालकर वैश्विक पाठकों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने गीतों और संगीत के माध्यम से उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट प्रतिष्ठा दिलाई है। उनके गीतों में उत्तराखंड का जनजीवन, प्रकृति, संघर्ष, संवेदनाएं और सामाजिक सरोकार पूरी ताकत के साथ दिखाई देते हैं।

गढ़रत्न नेगी जी की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि उन्होंने पहाड़ को सिर्फ गाया नहीं, बल्कि पहाड़ की आवाज को शब्द और सुर दिए। खेत-खलिहान से लेकर पलायन तक, रिश्तों से लेकर सामाजिक विसंगतियों तक उनके गीतों में उत्तराखंड का जीवन धड़कता है। यही वजह है कि उनकी रचनाएं पीढ़ियां बदलने के बावजूद लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए हुए हैं।
गढ़रत्न नेगी जी के नाम पर सम्मान, अरुणाचल के कलाकार को मिला सम्मान
समारोह में अरुणाचल प्रदेश के अभिनेता, रंगकर्मी और नाटककार ताई तुगुंग को ‘नरेंद्र सिंह नेगी संस्कृति सम्मान-2026’ प्रदान किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सम्मान हिमालयी राज्यों में संस्कृति, साहित्य, कला और सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रतिभाओं को समर्पित है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ताई तुगुंग ने न्यीशी भाषा, अरुणाचली हिंदी, रंगमंच, नाटक और सिनेमा के माध्यम से अरुणाचल की लोकसंस्कृति और परंपराओं को पहचान दिलाई है।
लोकभाषा से लेकर लोकवाद्य तक संरक्षण पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति उसकी आत्मा और पहचान है। जागर, बेड़ा, मांगल, खुदेड़ और छोपाटी जैसे पारंपरिक गीतों के साथ ढोल, दमाऊ, हुड़का, मशक, तुर्री और भंकोरा जैसे लोकवाद्य इस विरासत की पहचान हैं।

सरकार की ओर से लोक कलाकारों को मंच और रोजगार उपलब्ध कराने के लिए सूचीबद्धकरण की प्रक्रिया सरल की गई है। अब तक 275 सांस्कृतिक दलों और 226 एकल कलाकारों को सूचीबद्ध किया जा चुका है।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों और कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए पात्र कलाकारों को प्रतिवर्ष निःशुल्क वाद्ययंत्र और वेशभूषा उपलब्ध कराई जा रही है। वहीं लोककला और साहित्य को जीवन समर्पित करने वाले बुजुर्ग एवं आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों और साहित्यकारों की मासिक पेंशन 3 हजार से बढ़ाकर 6 हजार रुपये की गई है।
नई पीढ़ी तक पहुंचेगी नेगी की विरासत
सरकार गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए छह माह की प्रशिक्षण कार्यशालाएं भी आयोजित कर रही है, ताकि नई पीढ़ी लोककलाओं और परंपराओं से जुड़ सके।
उत्तराखंड को पर्यटन के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति का राष्ट्रीय केंद्र बनाने के लिए प्रदेश में दो साहित्य ग्राम विकसित करने की दिशा में भी काम चल रहा है। इन स्थानों पर साहित्यकारों के लिए आवास, पुस्तकालय, अध्ययन केंद्र और संगोष्ठी जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है।
लेकिन इस पूरे आयोजन का सबसे भावुक और गौरवपूर्ण पक्ष यही रहा कि जिस लोकसंस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने के लिए सरकार योजनाएं बना रही है, उस संस्कृति को दशकों से अपने सुरों में जीवित रखने वाले नरेंद्र सिंह नेगी स्वयं समारोह के केंद्र में रहे।
नेगी के गीत पहाड़ की आवाज हैं और यह आवाज अब सिर्फ उत्तराखंड की घाटियों में नहीं, दुनिया की भाषाओं में भी सुनाई देगी।









