
नैनीताल, प्रेस 15 न्यूज। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि खुशहाली, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यहां होली महोत्सव की शुरुआत चीर बंधन से होती है। गांव-गांव में होल्यार मंडलियां ढोल-दमाऊं की थाप पर मंदिरों से घर-घर जाकर होली गायन करती हैं। राग-रागिनियों से सजी बैठकी और खड़ी होली में भक्ति, श्रृंगार और लोकजीवन की अनूठी झलक देखने को मिलती है।
होली से एक दिन पूर्व कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों से होल्यार नैनीताल पहुंचकर माँ नयना देवी मंदिर में एकत्र होते हैं। मां के आशीर्वाद के साथ मंदिर परिसर में खड़ी होली का आयोजन होता है। ढोल की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा और सुर-ताल का सामंजस्य वातावरण को भक्तिमय बना देता है।
चम्पावत के खेतीखान स्थित होली आयोजन एवं डॉक्यूमेंट्री निर्माण समिति के महासचिव देवेंद्र ओली ने बताया कि संस्था पिछले 21 वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में खड़ी होली का आयोजन कर रही है और पिछले 10 वर्षों से नैनीताल के माँ नयना देवी मंदिर में यह आयोजन कराती आ रही है।
खड़ी होली कुमाऊं की विशेष पहचान है, जिसे चम्पावत क्षेत्र में काली कुमाऊं के नाम से भी जाना जाता है। यहां 70 से 80 प्रतिशत लोग खड़ी होली गाते हैं। एकादशी के दिन गाई जाने वाली इस होली में भगवान की आराधना के साथ मन के विकारों और नकारात्मकता को दूर करने का संदेश निहित होता है।
ऑस्ट्रेलिया से आए पर्यटक डोरेईंग ने कहा कि नैनीताल आकर उन्हें उत्तराखंड की संस्कृति को करीब से जानने और होली महोत्सव में शामिल होने का अवसर मिला। उन्होंने इसे अविस्मरणीय अनुभव बताते हुए कहा कि यहां से लौटने का मन नहीं कर रहा।
युग मंच के संचालक जहूर आलम ने बताया कि कुमाऊनी होली की परंपरा चंद्रवंशी काल से चली आ रही है। इसमें खड़ी होली, बैठकी होली, महिला होली, बच्चों की होली और स्वांग शामिल हैं। युग मंच इस वर्ष अपनी 30वीं होली मना रहा है।
यह परंपरा पौष माह से शुरू होकर टीका तक लगभग तीन महीने चलती है। उन्होंने कहा कि होली गले मिलने और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देने वाला पर्व है, जिसमें धर्म और जाति से ऊपर उठकर सभी लोग एक साथ जुड़ते हैं। खड़ी होली की गायन शैली हर क्षेत्र में अलग होती है और कुमाऊं के विभिन्न जिलों की टीमें इसमें भाग लेने नैनीताल पहुंचती हैं।
(नैनीताल से वरिष्ठ पत्रकार कमल जगाती की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट)









