फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरे भकार (फूलदेई की पौराणिक कथा)

खबर शेयर करें -

हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। देवभूमि उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोकपर्व “फूलदेई” आज हर्षोउल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसी के साथ सूर्यदेव का मीन राशि में प्रवेश होने के साथ ही चैत्र मास का शुभारंभ हो गया है।

देवभूमि की लोक संस्कृति धर्म और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक है। यहां वर्ष भर अलग-अलग लोक पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें “फूलदेई” एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हर्षोल्लास से मनाया जाने वाला पर्व है।

Ad

यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश देता है। चैत्र संक्रांति के समय जब ऊंची पहाड़ियों की बर्फ पिघलने लगती है, सर्दियों की कठिनाइयाँ समाप्त होती हैं और पहाड़ बुरांश के लाल फूलों से सजने लगते हैं, तब पूरे क्षेत्र की खुशहाली और समृद्धि की कामना के साथ फूलदेई मनाया जाता है।

इस मौसम में फ्यूंली, बुरांश और बासिंग के पीले, लाल और सफेद फूल प्रकृति की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। यह पर्व नई ऋतु, नए वर्ष और नए फूलों के आगमन का संदेश लेकर आता है।

फूलदेई मुख्य रूप से बच्चों और किशोरी लड़कियों का पर्व माना जाता है। इस दिन सुबह-सुबह बच्चे और लड़कियां जंगलों और खेतों से फ्यूंली, बुरांश, बासिंग और कचनार जैसे सुंदर फूल इकट्ठा करते हैं। इन फूलों को थाली या टोकरी में सजाया जाता है। टोकरी में गुड़, चावल, नारियल और कुछ पैसे भी रखे जाते हैं।

इसके बाद बच्चे गांव या मोहल्ले के घर-घर जाकर देहरी (मुख्य द्वार) पर फूल और चावल चढ़ाते हैं और घर की खुशहाली की कामना करते हैं। इस दौरान वे एक पारंपरिक गीत गाते हैं “फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरे भकार, यो देई पूजूं बारम्बार।”

फूलदेई की पौराणिक कथा

मान्यता के अनुसार एक बार भगवान शिव गहन शीतकालीन तपस्या में लीन हो गए। कई वर्षों तक उनकी तंद्रा नहीं टूटी, जिससे कैलाश पर्वत पर माता पार्वती और शिवगणों को नीरसता का अनुभव होने लगा।

तब माता पार्वती ने एक अनोखी योजना बनाई। जैसे ही कैलाश में फ्योली के पीले फूल खिले, माता पार्वती ने सभी शिवगणों को उन्हीं फूलों से बने पीताम्बरी वस्त्र पहनाए और उन्हें छोटे-छोटे बच्चों का रूप दे दिया।

फिर उन्होंने सभी शिवगणों से कहा कि वे देवताओं की पुष्पवाटिकाओं से सुगंधित फूल चुनकर लाएं। शिवगण फूल लेकर आए और सबसे पहले उन्हें तपस्या में लीन भगवान शिव को अर्पित किया, जिसे “फूलदेई” कहा गया।

इस दौरान शिवगण गाने लगे “फूलदेई, क्षमा देई…” ताकि तपस्या में बाधा डालने के लिए भगवान शिव उनसे क्षमा कर दें।

बच्चों के मधुर स्वर और फूलों की सुगंध से भगवान शिव की तंद्रा भंग हो गई। परंतु बालस्वरूप शिवगणों को देखकर वे क्रोधित नहीं हुए, बल्कि प्रसन्न होकर स्वयं भी इस फूलों की क्रीड़ा में शामिल हो गए। उस दिन कैलाश में उल्लास का वातावरण छा गया।

मान्यता है कि वह दिन मीन संक्रांति का था। तभी से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में “फूलदेई” को एक लोकपर्व के रूप में हर्षोल्लास से मनाया जाने लगा। इसलिए इसे “बच्चों का त्योहार” भी कहा जाता है।

हमारा कर्तव्य है कि अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं को सहेजकर रखें और नई पीढ़ी को भी इसके प्रति जागरूक करें। आप सभी को कुमाऊनी लोक पर्व “फूलदेई” की हार्दिक शुभकामनाएं।

What’s your Reaction?
+1
0
+1
1
+1
0
+1
0
+1
0

संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

सम्बंधित खबरें