
पिथौरागढ़/ हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। उत्तराखंड की लोककला केवल रंगों और आकृतियों का संसार नहीं, बल्कि यह पहाड़ की मिट्टी, परंपराओं, आस्था और सदियों पुराने संस्कारों की जीवंत अभिव्यक्ति है।
इसी विरासत को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा मूल रूप से पिथौरागढ़ और वर्तमान में हल्द्वानी निवासी तनुजा ज्याला ने उठाया है। तनुजा पारंपरिक ऐपण कला के जरिए उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई देने के साथ ही स्थानीय हुनर को आत्मनिर्भरता से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।
तनुजा का प्रयास केवल ऐपण चित्र बनाने तक सीमित नहीं है। उनकी कोशिश है कि उत्तराखंड की इस विशिष्ट लोककला को घरों और पूजा स्थलों की चौखट से निकालकर आधुनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए और इसे देश-दुनिया तक पहुंचाया जाए। इसके माध्यम से वह स्थानीय कला, कलाकारों और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तलाशने की दिशा में भी काम कर रही हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आत्मनिर्भर उत्तराखंड और स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने के संकल्प से प्रेरित तनुजा मानती हैं कि पहाड़ की लोककलाओं में संस्कृति के साथ-साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता की भी बड़ी संभावनाएं छिपी हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि स्थानीय कलाकारों को सही मंच, सम्मान और बाजार उपलब्ध कराया जाए।
तनुजा कहती हैं कि उत्तराखंड की लोककलाएं हमारी पहचान हैं। आज जब नई पीढ़ी तेजी से आधुनिक जीवनशैली की ओर बढ़ रही है, ऐसे समय में अपनी जड़ों और परंपराओं से उसका जुड़ाव बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐपण कला इस जुड़ाव का सुंदर माध्यम बन सकती है।
उनका सपना है कि उत्तराखंड की कला और यहां के हुनरमंद कलाकारों को केवल प्रदेश तक सीमित न रहना पड़े, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले। वह कहती हैं कि मेरी कोशिश भले छोटी हो, लेकिन सपना बड़ा है। मैं चाहती हूं कि उत्तराखंड की लोककला और यहां के हुनरमंद कलाकारों को देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान मिले।
तनुजा का मानना है कि यदि स्थानीय कला को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए और युवाओं को इसे व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो पलायन की चुनौती के बीच भी पहाड़ में स्वरोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं। लोककला को सहेजने के साथ उससे आजीविका का अवसर पैदा करना उनकी पहल की खास बात है।
ऐपण कला के माध्यम से तनुजा एक ओर उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का प्रयास कर रही हैं, तो दूसरी ओर यह संदेश भी दे रही हैं कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी आत्मनिर्भर बना जा सकता है। उनकी पहल लोकल से ग्लोबल की ओर बढ़ते उत्तराखंड के उस सपने की तस्वीर है, जहां संस्कृति पहचान भी बने और रोजगार का आधार भी।









