
उत्तराखंड के पहाड़ों की खूबसूरती, संस्कृति और सभ्यता के बीच बदलते दौर की टीस को युवा उत्तम सिंह बिष्ट ने अपनी कविता में आवाज दी है।
उत्तराखंड क्रांति दल के नैनीताल जिला महामंत्री बिष्ट ने ‘मैं उत्तराखंड बोल रहा हूं’ के जरिए पहाड़ के दर्द, पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली से लेकर खनन और शराब के बढ़ते प्रभाव तक पर तीखे सवाल उठाए हैं।
उनकी कविता में एक ऐसे उत्तराखंड की पीड़ा झलकती है, जो अपनी प्राकृतिक संपदा पर गर्व तो करता है, लेकिन अपनी संस्कृति, गांवों, पाठशालाओं और युवाओं के भविष्य को धीरे-धीरे खोता देख बिना आंसू और बिना आवाज के रो रहा है।
कविता सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछते हुए उस उत्तराखंड की तस्वीर सामने रखती है, जो देवभूमि होने के साथ अपने गौरवशाली अतीत और बेहतर भविष्य के बीच आज खुद को असहाय महसूस कर रहा है।
मैं उत्तराखंड बोल रहा हूं..
जो बिना आंसू, बिना आवाज के रो रहा है,
मुझे पता ही नहीं है, मेरी संस्कृति, मेरी सभ्यता
का पतन धीरे-धीरे हो रहा है।
मुझे कुदरत ने तो बला की खूबसूरती दे रखी है।
मगर लीसा, बजरी चोर और खनन माफियाओं के
राजनीतिक साठगांठ ने,
दाग-धब्बों में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।
मैं उत्तराखंड बोल रहा हूं…
जो बिना आवाज के रो रहा है…
मैं कहीं कोई सवाल न पूछ लूं, इसलिए
सियासत के भेड़ियों ने कदम-कदम पर मधुशालाओं के इंतजाम कर रखे हैं।
अब मैं इनसे यह भी नहीं पूछता,
स्वास्थ्य सुविधाओं और अस्पतालों के लिए बजट का रोना क्यों रोते हो।
मधुशालाओं की तर्ज पर ही सही,
आखिर क्यों नहीं जनता को सुविधाएं देते हो।
कुछ स्कूल, जो बुजुर्गों की मेहरबानी से बन पड़े थे,
यहीं उन्हीं से पढ़कर कुछ काबिल बन पाया था।
फिर सियासी भेड़ियों ने शिक्षा माफिया को जन्म दे दिया।
अब पुराने स्कूलों में बजट और आबादी का रोना रोया जाता है।
पब्लिक स्कूल के बस्तों का बोझ मां-बाप से अब कहां ढोया जाता है।
मेरी पाठशाला मुझको नैतिक शिक्षा सिखाती थी,
उसमें अब ताले पड़ने लगे हैं।
कॉन्वेंट और प्राइवेट स्कूलों की टाई-बेल्ट से
अब लोगों के स्टैंडर्ड बढ़ने लगे हैं।
मैं उत्तराखंड बोल रहा हूं…
अब रोजगार मांगना भी
इन सियासी भेड़ियों से गुनाह हो गया।
पेपर लीक, भर्ती रद्द, कमेटी गठन जैसे
कुछ शब्द समूहों ने अब मन उचाट-सा कर दिया है।
मैं युवा उत्तराखंड हूं।
मेरा इतिहास बहुत प्राचीन है।
पुराणों में मुझे मानस खंड भी कहते हैं।
मैं देवताओं की भूमि हूं।
मैं देवाधिदेव महादेव का आवास कैलाश हूं।
संपूर्ण धारा को जीवन देने भागीरथ जिस गंगा को लाए, मैं उसी भागीरथ का विश्वास हूं।
मैं उत्तराखंड बोल रहा हूं… जो बिना आंसू, बिना आवाज के रो रहा है…










