
आधुनिक जीवन की भागदौड़ में इंसान के आसपास लोगों की भीड़ तो बढ़ती जा रही है, लेकिन मन के भीतर संवाद और आत्मीयता कहीं कम होती जा रही है। घर, रिश्ते और संपर्क होने के बावजूद जब दिल की बात सुनने और समझने वाला कोई नहीं मिलता, तब भीड़ के बीच भी अकेलापन महसूस होने लगता है। वहीं एकांत इससे बिल्कुल अलग है एकांत वह अवस्था है, जहां इंसान दुनिया से दूर होकर खुद से मिलने और अपने अंतर्मन को समझने की कोशिश करता है।
इसी गहरे भाव को शब्दों में पिरोते हुए हल्द्वानी के पीलीकोठी निवासी वरिष्ठ साहित्यकार शोभा लोहनी ने यह संवेदनशील कविता रची है। कविता में उन्होंने अकेलेपन और एकांत के बीच के महीन अंतर को बेहद सहजता से समझाया है। साथ ही यह संदेश भी दिया है कि अकेलेपन में डूबने के बजाय व्यक्ति अपने एकांत को आत्मचिंतन, आत्मविश्वास और स्वयं की खोज का माध्यम बना सकता है।

वरिष्ठ लेखिका शोभा लोहनी समसामयिक मुद्दों, रिश्ते-नातों, प्रकृति और आध्यात्म जैसे विषयों पर अपने संवेदनशील और शानदार लेखन के लिए जानी जाती हैं। प्रस्तुत कविता भी उनके इसी चिंतनशील और आत्मीय लेखन की सुंदर अभिव्यक्ति है।
आधुनिकता की इस भीड़ में
जी रहे कुछ लोग अकेलेपन की पीड़ा में
यूं तो एकांत और अकेलापन दोनों लगते एक हैं
पर दोनों की ही दिशा रहती सदा विपरीत है।
आज के इस दौर में घर बढ़े, संपर्क बढ़े, पर कम हुए संवाद
मन के भीतर अकेलापन तब करता है निवास
ऐसा नहीं कि उनके कोई होते नहीं अपने
पर उनके दिल की बातें कोई नहीं समझें
अकेलापन मन में जन्म लेता है तब
दिल की बातें सुनने वाला कोई नहीं हो जब
मन पर तन्हाई छा जाती, कोई खुशी नजर ना आती
तब भीड़ भरी बस्ती में भी मन को सुनसानी है लगती।खुद की खोज करें हम जब वो एकांत होता है
औरों को जब ढूंढे उसे अकेलापन कहते हैं
एकांत है दीपक जैसा मन में भरे प्रकाश
जीवन की सच्ची राह दिखाकर मन को करे उजास
एकांत खोले ज्ञान कपाट अकेलापन मोह बढ़ाता है
खुश रहना गर तुमको तो अंतर्मन में झांक लें
आत्मविश्वास से भर खुद को एक नई पहचान दें
अकेलेपन को अपने एकांत में तब्दील करें
स्वयं को पहचान कर मन दर्पण अपना साफ करें…









