चिंतन: वर्तमान दौर और दरकते रिश्ते

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रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि विश्वास, समय, संवेदनाओं और संवाद से बनते हैं। लेकिन आज का दौर जितनी तेजी से तकनीक, सुविधाओं और आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है। विडंबना यह है कि हमारे पास सैकड़ों ऑनलाइन संपर्क हैं, पर मन की बात कहने वाला एक अपना इंसान ढूंढ़ना मुश्किल होता जा रहा है।

आज परिवार एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अलग-अलग दुनिया में जी रहा है। माता-पिता मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त हैं, बच्चे सोशल मीडिया में खोए हैं और बुजुर्ग अपने ही घर में उपेक्षा का दर्द सह रहे हैं।

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बातचीत की जगह चैट ने ले ली है और अपनापन अब इमोजी तक सिमटता जा रहा है। रिश्तों की नींव संवाद पर टिकी होती है, लेकिन जब संवाद कम होने लगता है तो गलतफहमियां जन्म लेने लगती हैं और दूरियां बढ़ने लगती हैं।

प्रतिस्पर्धा और भौतिक सफलता की अंधी दौड़ ने भी रिश्तों को कमजोर किया है। आज व्यक्ति सफलता तो चाहता है, लेकिन उसके लिए समय, धैर्य और संवेदनाएं खोता जा रहा है। करियर और कमाई की भागदौड़ में परिवार के लिए समय निकालना कठिन होता जा रहा है। नतीजा यह है कि रिश्ते औपचारिकता निभाने तक सीमित हो रहे हैं।

एक और चिंता का विषय यह है कि अब रिश्तों का मूल्य भावनाओं से अधिक स्वार्थ और सुविधा के आधार पर आंका जाने लगा है। जब तक लाभ है, तब तक संबंध हैं; जैसे ही स्वार्थ समाप्त होता है, रिश्ते भी कमजोर पड़ने लगते हैं। यह प्रवृत्ति समाज की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

हालांकि इसके लिए केवल तकनीक या आधुनिक जीवनशैली को दोष देना उचित नहीं होगा। तकनीक ने दूर बैठे लोगों को जोड़ा भी है।

समस्या तब पैदा होती है, जब हम तकनीक को रिश्तों का विकल्प बना देते हैं। कोई भी संदेश, वीडियो कॉल या सोशल मीडिया पोस्ट उस आत्मीयता की जगह नहीं ले सकता, जो आमने-सामने बैठकर कुछ पल साथ बिताने में मिलती है।

रिश्तों को मजबूत रखने के लिए बहुत बड़े प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती। थोड़ा समय, कुछ सच्चे शब्द, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान, क्षमा करने की आदत और कठिन समय में साथ खड़े रहने का विश्वास ही किसी भी रिश्ते को जीवंत बनाए रखता है। रिश्ते अधिकार से नहीं, अपनत्व से निभाए जाते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता को अपनाएं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को न खोएं। क्योंकि जब रिश्ते दरकते हैं तो केवल दो व्यक्ति दूर नहीं होते, बल्कि समाज की सबसे मजबूत नींव भी कमजोर पड़ने लगती है। विकास की असली पहचान ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि मजबूत और संवेदनशील रिश्तों से होती है। यही वह पूंजी है, जो हर युग में इंसान को इंसान बनाए रखती है।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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