नैनीझील के दो शव और समाज से उठते असहज सवाल: आखिर लोग जिंदगी से हार क्यों मान रहे हैं?

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नैनीताल, प्रेस 15 न्यूज। नैनीझील ने लगातार दो दिनों में दो जिंदगियों को अपने भीतर समेट लिया। एक दिन पहले 45 वर्षीय व्यक्ति का शव झील में मिला और आज सुबह एक अन्य अधेड़ का शव बरामद हुआ। इन घटनाओं ने सिर्फ पुलिस और प्रशासन को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को भी आईना दिखाने का काम किया है।

शुक्रवार 26 जून की सुबह तल्लीताल के फांसी गधेरा क्षेत्र स्थित पाषाण देवी मंदिर के समीप मॉर्निंग वॉक पर निकले लोगों ने झील में एक शव उतराता देखा।

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सूचना पर पहुंची पुलिस ने शव की पहचान मल्लीताल बड़ा बाजार निवासी 45 वर्षीय मनीष साह के रूप में की। बताया गया कि एक रात पहले उन्होंने अपनी बहन को वीडियो कॉल कर जीवन समाप्त करने जैसा बड़ा कदम उठाने की बात कही थी। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

लेकिन इस घटना का सदमा अभी कम भी नहीं हुआ था कि शनिवार 27 जून की सुबह मल्लीताल स्थित एनसीसी प्रशिक्षण केंद्र और माँ मायना देवी मंदिर के पास झील में एक और शव दिखाई दिया। सूचना पर पहुंची पुलिस ने शव बाहर निकाला।

तलाशी में जेब से चार हजार रुपये मिले और बाद में परिजनों ने उनकी पहचान ऑल सेंट्स स्कूल में सफाई कर्मचारी के रूप में कार्यरत लगभग 48-50 वर्षीय महिंदर चौहान के रूप में की। पुलिस के अनुसार प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी मौत डूबने से कुछ समय पहले ही हुई थी। शव को चिकित्सकीय परीक्षण के लिए बी.डी. पांडे अस्पताल भेजा गया।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल पुलिस जांच से भी आगे है। दो दिनों में दो मौतें… और दोनों के पीछे संभावित रूप से गहरी मानसिक पीड़ा।

आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि लोग अपने भीतर चल रहे तूफान को किसी से साझा नहीं कर पा रहे? क्यों एक व्यक्ति को अपनी बहन से वीडियो कॉल पर अंतिम बात कहनी पड़ती है? क्या उसके आसपास कोई ऐसा नहीं था जो उसकी बात सुन लेता, उसका हाथ पकड़ लेता, उससे कह देता रुक जाओ, यह समय भी गुजर जाएगा।

क्या हमारी जिंदगी इतनी भागदौड़ और आत्मकेंद्रित हो चुकी है कि पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति के चेहरे पर छाई उदासी भी हमें दिखाई नहीं देती? क्या हमने रिश्तों को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित कर दिया है?

आज हम एक ही घर में रहते हुए घंटों मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि सामने बैठा व्यक्ति भीतर से टूट तो नहीं रहा। कॉलोनियों में लोग वर्षों साथ रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे की परेशानियों से अनजान बने रहते हैं। समाज में आर्थिक संकट, पारिवारिक तनाव, अकेलापन, असुरक्षा और भविष्य की चिंता बढ़ रही है, लेकिन संवेदनशील संवाद घटता जा रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि आत्महत्या का विचार अक्सर अचानक नहीं आता, बल्कि यह लंबे समय तक चलने वाले अवसाद, निराशा, अकेलेपन और असहायता की भावना का परिणाम हो सकता है। ऐसे में परिवार, मित्र, पड़ोसी, सहकर्मी और समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

शायद हमें फिर से अपने सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की जरूरत है। किसी परिचित के चेहरे पर उदासी दिखे तो उससे दो मिनट बात कर लें। किसी का फोन कई दिनों से बंद हो तो हालचाल पूछ लें। किसी पड़ोसी को चुपचाप संघर्ष करते देखें तो उसके दरवाजे पर दस्तक दे दें।

क्योंकि कई बार किसी टूटते हुए इंसान को बड़ी सलाह नहीं, सिर्फ यह एहसास चाहिए होता है कि तुम अकेले नहीं हो, हम तुम्हारे साथ हैं।

इन दो घटनाओं की जांच पुलिस करेगी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आएगी, लेकिन समाज को भी अपने भीतर झांककर यह सवाल जरूर पूछना होगा क्या हम सचमुच एक-दूसरे के लिए समय निकाल पा रहे हैं, या फिर संवेदनाएं भी हमारी व्यस्त जिंदगी की भीड़ में कहीं खोती जा रही हैं?

(नैनीताल से वरिष्ठ पत्रकार कमल जगाती की रिपोर्ट)

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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