Nainital: खैरना की घटना से उठता सवाल! बच्चों की परवरिश में हम संस्कार तो दे रहे, संवाद क्यों नहीं?

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नैनीताल, प्रेस 15 न्यूज। नैनीताल जिले के खैरना क्षेत्र के एक गांव से सामने आया मामला बदलते सामाजिक परिवेश, किशोर-किशोरियों की बदलती दुनिया और लोकलाज के दबाव में सच को छिपाने की प्रवृत्ति पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

जानकारी के अनुसार, क्षेत्र की एक नाबालिग किशोरी करीब आठ माह की गर्भवती पाई गई। दर्द की शिकायत के बाद परिजन उसे नैनीताल स्थित बी.डी. पांडे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। चिकित्सकीय जांच में जब गर्भावस्था की बात सामने आई तो परिजन भी स्तब्ध रह गए।

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मामला गंभीर होने के चलते अस्पताल की ओर से संबंधित कोतवाली को मेमो भेजा गया। लेकिन पुलिस मामले की जानकारी लेकर अस्पताल पहुंचती, इससे पहले ही परिजन किशोरी को अपने साथ लेकर वहां से चले गए। इसके बाद से मामला और भी गंभीर सवालों के घेरे में है।

आखिर पुलिस के पहुंचने से पहले क्यों चले गए परिजन?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अस्पताल ने जब पुलिस को सूचना भेजी तो पुलिस के पहुंचने से पहले ही किशोरी को लेकर परिजन क्यों चले गए?

क्या उन्हें समाज और रिश्तेदारों की बदनामी का डर था? क्या परिवार लोकलाज के बोझ तले किसी सच को दबाने की कोशिश कर रहा है? या फिर इस पूरे मामले के पीछे कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसका नाम सामने आने से परिवार डर रहा है?

इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल किशोरी की पहचान और उसकी निजता की रक्षा बेहद जरूरी है।

मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में बच्चों तक कौन पहुंचा रहा सही समझ?

यह घटना केवल एक परिवार की कहानी मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकती। आज बच्चे पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया के संपर्क में हैं। मोबाइल, इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों ने जानकारी की पहुंच आसान की है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में यही दुनिया बच्चों के लिए खतरा भी बन सकती है।

मां-बाप के सामने भी अब चुनौती सिर्फ बच्चों को पढ़ाने और अच्छी सुविधाएं देने की नहीं है। उन्हें यह भी समझना होगा कि बच्चे किससे बात कर रहे हैं, किस संगत में हैं, उनकी मानसिक स्थिति क्या है और उनके जीवन में क्या चल रहा है।

लेकिन सवाल सिर्फ परिवार से भी नहीं है…

क्या स्कूलों में किशोरों को उम्र के अनुरूप सही यौन शिक्षा, सुरक्षा और अच्छे-बुरे स्पर्श की जानकारी मिल रही है? क्या परिवार बच्चों से ऐसे विषयों पर खुलकर बात करने का माहौल बना पा रहे हैं? और जब कोई बच्चा किसी मुसीबत में फंसता है तो क्या वह बिना डर अपने माता-पिता से बात कर सकता है?

लोकलाज से बड़ा है बच्चे का भविष्य

इस मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि किशोरी को दोष देने के बजाय उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति को प्राथमिकता दी जाए। नाबालिग की पहचान सार्वजनिक करना या उसके बारे में तरह-तरह की चर्चाएं करना उसके भविष्य को और मुश्किल में डाल सकता है।

लोकलाज के डर से अगर परिवार किसी घटना को छिपाता है तो समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि कई बार और गंभीर हो जाती है। बदनामी के डर से सच छिपाने के बजाय सच का सामना करना जरूरी है।

किशोरी अस्पताल से चली गई, लेकिन उसके पीछे कई सवाल छोड़ गई वह इस स्थिति तक कैसे पहुंची? उसके साथ क्या हुआ? उसे समय रहते मदद क्यों नहीं मिल पाई? और क्या परिवार अब भी सच सामने आने से डर रहा है?

इन सवालों का जवाब जांच से ही मिलेगा। मगर समाज के लिए यह घटना एक चेतावनी जरूर है बच्चों को केवल संस्कारों का पाठ पढ़ाना पर्याप्त नहीं, उनके साथ संवाद का दरवाजा भी हमेशा खुला रखना होगा।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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