हल्द्वानी: न अस्पताल ने निभाई जिम्मेदारी, न पुलिस ने सुनी पुकार… कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई एफआईआर

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हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। हल्द्वानी में इलाज के नाम पर निजी अस्पतालों की मनमानी और लूट किसी से छिपी नहीं है। बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचने वाला मरीज कई बार डॉक्टरों की कथित लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुकाता है।

इससे भी अधिक पीड़ादायक यह है कि जब पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लेकर पुलिस के दरवाजे पहुंचता है तो अक्सर उसे निराशा ही हाथ लगती है। आखिरकार मजबूर होकर न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है।

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हल्द्वानी में ऐसा ही एक मामला फिर सामने आया है, जिसने न केवल एक निजी अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि हल्द्वानी पुलिस की संवेदनहीन और अमानवीय कार्यशैली को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।

मुखानी रोड स्थित द प्राइड हॉस्पिटल में किडनी की पथरी के ऑपरेशन के बाद एक मरीज की मौत के मामले में आखिरकार अदालत के हस्तक्षेप के बाद पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी।

न्यायालय के आदेश पर हल्द्वानी कोतवाली पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 106(1) के तहत अस्पताल के अज्ञात चिकित्सकों और अन्य स्टाफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

यहां कोतवाली पुलिस का एक और खेल देखिए। पीड़ित की ओर से जो तहरीर दी गई उसमें प्राइड अस्पताल के एक डॉक्टर का जिक्र है। कोर्ट से मामले में मुकदमा दर्ज करने के आदेश भी दिए जा चुके हैं, बावजूद इसके कोतवाली पुलिस ने अज्ञात डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। ऐसे में कोतवाली में बैठे वर्दीधारियों की नियत और कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।

मामला किशनपुर घुड़दौड़ा निवासी ललित मोहन सिंह की मौत से जुड़ा है। परिजनों के अनुसार पेट दर्द की शिकायत पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांच में किडनी में पथरी मिलने के बाद 24 सितंबर 2025 को ऑपरेशन किया गया।

आरोप है कि ऑपरेशन से पहले मरीज की स्थिति सामान्य थी, लेकिन कुछ ही घंटों बाद अस्पताल ने उनकी हालत बिगड़ने की जानकारी दी। बाद में दूसरे निजी अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

दिवंगत के भाई भरत मोहन सिंह का आरोप है कि इलाज में गंभीर लापरवाही बरती गई और मौत के वास्तविक कारणों को भी स्पष्ट नहीं किया गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि परिजन जब न्याय की उम्मीद लेकर सीएमओ, कोतवाली और एसएसपी कार्यालय तक पहुंचे, तब भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यदि न्यायालय हस्तक्षेप न करता तो शायद यह मामला भी कई अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता।

सूत्रों के अनुसार, सीएमओ स्तर पर गठित विशेषज्ञ समिति की जांच में भी चिकित्सकीय लापरवाही के संकेत मिले थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सकों के बयानों में भी कई बिंदुओं पर अंतर सामने आया। इसके बावजूद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी और पीड़ित परिवार को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि उन हजारों आम लोगों की पीड़ा का प्रतीक है जो इलाज के नाम पर भारी रकम खर्च करते हैं और किसी अनहोनी की स्थिति में न्याय पाने के लिए वर्षों तक भटकते रहते हैं।

हर परिवार इतनी हिम्मत और संसाधन नहीं जुटा पाता, जितनी दिवंगत ललित मोहन सिंह के परिजनों ने दिखाई। अधिकांश लोग आर्थिक, सामाजिक और मानसिक दबाव के कारण चुप्पी साध लेते हैं और जिम्मेदार लोग बेखौफ बने रहते हैं।

अब इस पूरे प्रकरण में दो बड़े सवाल खड़े होते हैं यदि अस्पताल में लापरवाही हुई थी तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई में इतनी देर क्यों हुई? और यदि परिजनों की शिकायत में दम नहीं था तो अदालत को प्राथमिकी दर्ज कराने का आदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि आम नागरिक को न्याय पाने के लिए केवल अपनों को खोना ही नहीं पड़ता, बल्कि पुलिस और प्रशासन की उदासीनता से भी लड़ना पड़ता है। अब निगाहें पुलिस जांच पर हैं कि क्या यह जांच वास्तव में दोषियों तक पहुंचेगी या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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