चिंतन: जो जीवन ने सिखाया, वह किताबों में नहीं मिला

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प्रेस 15 न्यूज डेस्क। जीवन हमें हर दिन कुछ न कुछ सिखाता है, लेकिन सीख वही पाता है जो ठहरकर देखना जानता है। अधिकांश लोग समय के पीछे भागते रहते हैं, जबकि समय कभी किसी के पीछे नहीं भागता। जो बीत गया, वह स्मृति बन गया और जो आने वाला है, वह अभी केवल कल्पना है। सच तो केवल यह क्षण है, जो हमारी हथेली पर रखा हुआ है।

मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं कि उसके पास कम है, बल्कि यह है कि वह जो है, उसे भी पर्याप्त नहीं मानता। इच्छाएँ पूरी होती जाती हैं, लेकिन मन की प्यास नहीं बुझती। इसलिए संतोष का अर्थ इच्छाओं का अंत नहीं, बल्कि अपने भीतर की शांति को पहचानना है।

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जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी संघर्ष से गुजर रहा है। इसलिए किसी के चेहरे की मुस्कान देखकर यह मत समझिए कि उसके जीवन में कोई पीड़ा नहीं है। कई बार सबसे उजली मुस्कान के पीछे सबसे गहरे घाव छिपे होते हैं। यही कारण है कि दया से अधिक करुणा और आलोचना से अधिक समझ की आवश्यकता है।

प्रकृति हमें प्रतिदिन एक मौन शिक्षा देती है। वृक्ष पतझड़ में अपने पत्ते खो देते हैं, फिर भी निराश नहीं होते। उन्हें विश्वास होता है कि बसंत फिर आएगा। मनुष्य को भी अपने कठिन समय को अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन का मौसम समझना चाहिए।

याद रखिए, जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि दूसरों से आगे निकलना नहीं, बल्कि कल के अपने स्वरूप से बेहतर बनना है। जो व्यक्ति स्वयं को प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा सुधारता है, वही सच्चे अर्थों में सफल होता है।

जीवन को समझने का सबसे सरल सूत्र है कम शिकायतें, अधिक कृतज्ञता, कम अपेक्षाएँ, अधिक प्रेम, और कम भय, अधिक विश्वास। जब यह परिवर्तन भीतर होता है, तब बाहर की दुनिया भी पहले से अधिक सुंदर दिखाई देने लगती है।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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