
देहरादून/हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंत को भी समाज के उजाले में बदल कोई दे, तब वह केवल इंसान नहीं रहता, वह एक विचार बन जाता है, एक प्रेरणा बन जाता है।
मानवीय करुणा, सामाजिक उत्तरदायित्व और वैज्ञानिक चेतना की त्रिवेणी को अपने जीवन में आत्मसात करने वाले प्रोफेसर (डॉ.) राकेश चंद्र रयाल ने देहदान का संकल्प लेकर समाज को झकझोर देने वाला संदेश दिया है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि मानव सेवा की अगली यात्रा है।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं मीडिया विद्याशाखा के निदेशक के साथ साथ बहुआयामी प्रतिभा के भी धनी हैं। उत्तराखंड संगीत जगत में उनके गीत संगीत घर घर में सुना जाता है।
प्रो. (डॉ.) रयाल ने विधिवत शपथ पत्र भरते हुए मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी तथा दून मेडिकल कॉलेज, देहरादून को अपनी देह दान करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय भावी चिकित्सकों के लिए केवल अध्ययन का माध्यम नहीं बनेगा, बल्कि उन्हें यह सिखाएगा कि चिकित्सा विज्ञान की नींव करुणा और त्याग पर टिकी होती है।
देहरादून के दिल्लीफार्म, लक्ष्मण एन्क्लेव, मियांवाला चौक निवासी प्रो. (डॉ.) रयाल वर्तमान में उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी के पत्रकारिता एवं मीडिया स्कूल के निदेशक हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी पहचान जितनी गहरी है, मानवता के प्रति उनका समर्पण उससे कहीं अधिक व्यापक है।
अपने भावों को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि “देहदान मेरे लिए मृत्यु की तैयारी नहीं, मानव सेवा की निरंतरता है। यदि मेरे बाद भी मेरी देह किसी को जीवन का पाठ पढ़ा सके, तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।”
उनके इस संकल्प में केवल विज्ञान नहीं, संवेदना भी है। केवल तर्क नहीं, करुणा भी है। “जो दे सके मरकर भी जीवन का पाठ, वह मृत्यु से पहले ही अमर हो जाता है।”
प्रो. (डॉ.) रयाल केवल एक शिक्षाविद् नहीं हैं, वे उत्तराखंड की लोक आत्मा के सजग प्रहरी भी हैं। उनके गढ़वाली लोकगीत पहाड़ की पीड़ा, प्रकृति की सुंदरता और संस्कृति की सुगंध को नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं। लोकसंस्कृति को उन्होंने शब्दों में नहीं, जीवन में जिया है।
मीडिया शिक्षा, संचार और रोजगार के क्षेत्र में उनका योगदान असंख्य युवाओं के जीवन में आशा की किरण बना है। दूरदर्शन, आकाशवाणी और अन्य प्रतिष्ठित मंचों से प्रसारित उनके कार्यक्रमों ने युवाओं को दिशा दी, आत्मविश्वास दिया और समाज से जुड़ने का दृष्टिकोण दिया।
उन्होंने हल्द्वानी में देहदान के क्षेत्र में सक्रिय ‘अनमोल संकल्प सिद्धि फाउंडेशन’ के प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की और कहा कि ऐसे संगठन समाज में मृत्यु के प्रति भय नहीं, समझ और स्वीकार्यता का भाव पैदा कर रहे हैं। एमबीपीजी कॉलेज में सेवाएं दे चुके और देहदानी प्रो. संतोष मिश्रा से मिली प्रेरणा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सभी लोग मिलकर इस मानवीय आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे।
प्रो. (डॉ.) राकेश चंद्र रयाल का यह संकल्प हमें यह सिखाता है कि “जीवन की सार्थकता साँसों की गिनती में नहीं, उस उजाले में है जो हमारे बाद भी बाकी रहे।”
उनका यह निर्णय समाज के लिए केवल खबर नहीं, एक चेतावनी है, एक प्रेरणा है और मानवता के नाम एक मौन लेकिन अमर संदेश है।









