जनता के डीएम पर सियासी वार, बुद्धिजीवियों का पलटवार “काम देखिए, राजनीतिक चश्मा उतारिए”

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चंपावत, प्रेस 15 न्यूज। जनता की समस्याओं के समाधान के लिए आधी रात को डेंजर जोन तक पहुंचने वाला अधिकारी अगर राजनीतिक आरोपों के घेरे में आ जाए, तो सवाल सिर्फ एक जिलाधिकारी की कार्यशैली का नहीं, बल्कि जनसेवा को देखने के नजरिए का भी खड़ा होता है।

चंपावत के जिलाधिकारी मनीष कुमार को लेकर जिले में छिड़ी बहस के बीच बुद्धिजीवियों ने राजनीतिक बयानबाजी पर सवाल उठाते हुए उनकी कार्यशैली का समर्थन किया है। उनका कहना है कि किसी अधिकारी की पहचान राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि उसके काम और जनता को मिलने वाली राहत से तय होनी चाहिए।

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किसान परिवार से निकले जिलाधिकारी मनीष कुमार ने अपने करीब 16 महीने के कार्यकाल में सहज व्यवहार, जनसमस्याओं पर त्वरित कार्रवाई और मौके पर पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा लेने की कार्यशैली से अलग पहचान बनाई है। आम जनता के बीच प्रशासनिक दूरी कम करने और सरकारी योजनाओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के उनके प्रयासों की चर्चा होती रही है।

हाल ही में कांग्रेस के एक जनप्रतिनिधि की ओर से जिलाधिकारी पर भाजपा जिलाध्यक्ष की तरह काम करने संबंधी टिप्पणी ने इस बहस को हवा दे दी। इस बयान पर असहमति जताने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के कामकाज का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। यदि कहीं कोई कमी है, तो उस पर सवाल उठाए जाएं; लेकिन जनहित में किए जा रहे प्रयासों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

जनता को राहत देना अपराध है तो फिर जनसेवा का मतलब क्या?

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक नरेश राय ने कहा कि जनप्रतिनिधि और नौकरशाही लोकतांत्रिक व्यवस्था के पूरक हैं। दोनों की जिम्मेदारी जनता की समस्याओं का समाधान करना है। यदि कोई जिलाधिकारी गरीबों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने और लोगों की समस्याओं के निस्तारण के लिए सक्रियता दिखा रहा है, तो जनप्रतिनिधियों को इसे सकारात्मक रूप में लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रशासन की सक्रियता से जनता को राहत मिलती है और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियां भी आसान होती हैं। अधिकारियों को सरकार की नीतियों के अनुरूप काम करने के साथ जनता की भावनाओं और जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए।

नरेश राय के अनुसार, जिलाधिकारी मनीष कुमार की कार्यशैली में आम लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाई देती है। ऐसे में किसी अधिकारी के काम का आकलन केवल राजनीतिक टिप्पणी के आधार पर करना उचित नहीं है।

रात 12 बजे डेंजर जोन पहुंचना दिखावा नहीं, जिम्मेदारी का सवाल

राष्ट्रसेवा के बाद समाजसेवा में सक्रिय सेवानिवृत्त कैप्टन रघुवीर सिंह ने स्वाला डेंजर जोन का उदाहरण देते हुए कहा कि रात 12 से एक बजे के बीच जिलाधिकारी का मौके पर पहुंचना और काम में तेजी लाने के लिए व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना उनकी कार्यशैली को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि एक सैनिक संगठन के प्रतिनिधि के रूप में जब भी जिलाधिकारी से संवाद का अवसर मिला, उनकी कार्यशैली ने प्रभावित किया। उनका मानना है कि जनता को ऐसे अधिकारी की जरूरत है, जो समस्याओं को केवल कागजों में दर्ज करने के बजाय उनके समाधान के लिए जमीन पर उतरकर काम करे।

कैप्टन रघुवीर सिंह ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को सार्वजनिक बयान देते समय शब्दों और तथ्यों की गंभीरता समझनी चाहिए। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन आलोचना का मकसद व्यवस्था में सुधार होना चाहिए। यदि किसी अधिकारी के कामकाज में कमी है तो तथ्यों के साथ सवाल उठाए जाने चाहिए।

सियासी आरोपों से नहीं, काम के तराजू पर तौले जाएं अधिकारी

जिलाधिकारी की कार्यशैली पर चर्चा करते हुए नरेश राय ने उनके योगदान की तुलना जिले के पिछले 23 जिलाधिकारियों के कार्यकाल से करते हुए कहा कि मनीष कुमार ने अपने कामकाज से अलग छाप छोड़ने का प्रयास किया है।

यह टिप्पणी जिले में मौजूदा प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर बनी सकारात्मक धारणा को दर्शाती है। हालांकि, किसी भी अधिकारी का निष्पक्ष मूल्यांकन उसके निर्णयों, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता को मिले वास्तविक लाभ के आधार पर ही होना चाहिए।

बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया के बीच बहस का मूल सवाल यही है कि राजनीतिक आरोपों से ऊपर उठकर जनहित में किए जा रहे कामों का निष्पक्ष मूल्यांकन क्यों नहीं होना चाहिए?

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी अधिकारियों की निष्पक्षता भी है। जनता के हित में काम करने वाले अधिकारी से सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन सवालों की कसौटी राजनीति नहीं, तथ्य और जनहित होना चाहिए।

(लोहाघाट से वरिष्ठ पत्रकार गणेश दत्त पांडेय की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ✍️)

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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