
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। हल्द्वानी की सड़कों पर अगर आज डर का कोई नया नाम है, तो वह है सत्ता का नशा। 04 जनवरी 2026 की रात मानपुर उत्तर में हुई हत्या सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस सोच का आईना है, जिसमें राजनीतिक ओहदा, लाइसेंसी हथियार और पारिवारिक दबदबा मिलकर कानून को चुनौती देने लगते हैं।
हत्या के आरोप में गिरफ्तार वार्ड 55 का पार्षद और भाजपा मुखानी मंडल उपाध्यक्ष अमित बिष्ट उर्फ चिंटू कोई गुमनाम अपराधी नहीं था। वह सत्ता के गलियारों में पहचाना जाने वाला चेहरा था। सवाल यही है कि क्या राजनीतिक पद अब चरित्र का प्रमाण नहीं, बल्कि अपराध का कवच बनते जा रहे हैं?
पुलिस ने तेजी से कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार किया, हथियार बरामद किए और उसके 19 वर्षीय बेटे जय बिष्ट की भूमिका भी उजागर की। यह पुलिस की तत्परता का उदाहरण है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि अगर यही हथियार और यही हौसला किसी आम नागरिक के पास होता, तो क्या वह पहले ही कुचला नहीं जा चुका होता?
लाइसेंसी बंदूक से हत्या और बेटे के पास बिना लाइसेंस पिस्टल, यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उस संस्कृति की तस्वीर है, जहां घरों में डर नहीं, हथियार पलते हैं और बच्चों को कानून नहीं, दबदबे की विरासत सौंपी जाती है।
घटना के बाद पार्टी द्वारा निष्कासन किया गया, लेकिन यह कदम सवालों से ज्यादा जवाब नहीं देता। जब तक हत्या नहीं हुई, तब तक यह “चिंटू” स्वीकार्य था। अपराध सामने आया तो अचानक अस्वीकार्य हो गया। क्या यही राजनीतिक नैतिकता है?
आज हल्द्वानी पूछ रहा है, क्या सत्ता का स्वाद लेते ही इंसान को यह भ्रम हो जाता है कि कानून उसके लिए नहीं है?
क्या हर गली में कोई न कोई “चिंटू” इस इंतजार में है कि कब विवाद बढ़े और बंदूक बोले?
यह मामला किसी एक दल, एक व्यक्ति या एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो रसूख को रोक नहीं पाती, हथियारों की निगरानी ढीली छोड़ देती है और अपराध के बाद सिर्फ औपचारिक बयान देकर अपने हाथ झाड़ लेती है।
जब तक सत्ता और हथियार के इस खतरनाक गठजोड़ को जड़ से नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक हर शहर, हर मोहल्ला यही पूछता रहेगा… सत्ता के नशे में और कितने “चिंटू” घूम रहे हैं?









