
बागेश्वर, प्रेस 15 न्यूज। इंग्लैंड में जन्मे लेकिन उत्तराखंड की संस्कृति और मानवीय मूल्यों से गहरे जुड़ चुके समाजसेवी डेविड हॉपकिंस को मंगलवार को बागेश्वर में नम आंखों से अंतिम विदाई दी गई। हिंदू रीति-रिवाज से हुए अंतिम संस्कार में उनकी पुत्री ने चिता को मुखाग्नि दी। इस भावुक क्षण में बड़ी संख्या में ग्रामीण और उनके सहयोगी मौजूद रहे।
85 वर्षीय डेविड हापकिंस लंबे समय से कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम से जुड़े थे और गांधीवादी विचारधारा के साथ ग्रामीण समाज के बीच काम कर रहे थे। मूल रूप से इंग्लैंड निवासी डेविड वर्ष 1973 में भारत आए और तभी से उन्होंने उत्तराखंड की धरती को अपनी कर्मभूमि बना लिया। यहां रहते हुए उन्होंने ग्रामीण विकास, महिला शिक्षा और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
डेविड को पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और पर्यावरण से विशेष लगाव था। वे जंगलों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहते थे और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर समाज सेवा के कार्य करते रहे। इसी कारण क्षेत्र के लोगों के बीच उन्हें बेहद सम्मान और स्नेह मिला।
सोमवार को कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में उनका निधन हो गया। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर बागेश्वर लाया गया, जहां सरयू गोमती संगम पर हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान उनकी पुत्री दीपिका हापकिंस ने चिता को मुखाग्नि दी।
अंतिम संस्कार में गांव के लोग, समाजसेवी और आश्रम से जुड़े कई लोग मौजूद रहे। सभी ने नम आंखों से उन्हें विदाई देते हुए कहा कि डेविड हापकिंस का जीवन सेवा, सादगी और मानवीय मूल्यों का प्रेरक उदाहरण रहेगा।
(वरिष्ठ पत्रकार कमल जगाती की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ✍️)









