
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। डेढ़ साल तक अदालत की चौखट पर दस्तक, लंबी कानूनी लड़ाई और आखिरकार फैसला भी अपने पक्ष में… लेकिन जीत के बाद कहानी जैसे अचानक पर्दे के पीछे चली गई। जिस फैसले ने वार्ड नंबर-9 की कुर्सी खाली कर दोबारा चुनाव का रास्ता खोला, उसकी तय समय-सीमा अब खत्म होने की कगार पर है।
फिर भी न चुनाव की हलचल दिख रही है, न संगठन की आवाज सुनाई दे रही है और न ही सिस्टम की कोई जल्दबाजी। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि चुनाव कब होगा… असली सवाल यह है कि आखिर किसके इंतजार में पूरा सिस्टम खामोश बैठा है? और सबसे चौंकाने वाली बात जिस कानूनी लड़ाई की जीत भाजपा से जुड़े गिरीश नैनवाल ने हासिल की, उसी जीत पर भाजपा संगठन की चुप्पी आखिर किस कहानी की ओर इशारा कर रही है?
हल्द्वानी नगर निगम के वार्ड नंबर-9 के पार्षद राजेंद्र सिंह जीना के निर्वाचन को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में हाईकोर्ट ने फिलहाल उन्हें कोई राहत नहीं दी है। जिला न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राजेंद्र जीना को न तो स्थगन दिया और न ही आगामी चुनाव लड़ने की अंतरिम अनुमति प्रदान की।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी एवं न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में हुई। राजेंद्र सिंह जीना की ओर से जिला न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने तथा आगामी निर्वाचन में चुनाव लड़ने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि वार्ड नंबर-9 में चुनाव होता है तो उसका परिणाम हाईकोर्ट के अंतिम आदेश के अधीन रहेगा। मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर 2026 को होगी।
लेकिन इस पूरे मामले में असली सवाल अब सिर्फ राजेंद्र जीना को हाईकोर्ट से राहत मिलने या न मिलने का नहीं है। सवाल यह है कि करीब डेढ़ साल तक अदालत में चुनावी प्रक्रिया के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़कर जिला न्यायालय से फैसला अपने पक्ष में कराने वाले गिरीश नैनवाल की जीत के बाद अब प्रशासन और राजनीतिक संगठन आखिर कर क्या रहे हैं?
तीन महीने में चुनाव कराने का आदेश फिर अब तक खामोशी क्यों?
करीब तीन महीने पहले जिला न्यायालय ने राजेंद्र सिंह जीना के निर्वाचन को अवैध घोषित करते हुए वार्ड नंबर-9 की सीट रिक्त करने का आदेश दिया था। न्यायालय ने नामांकन पत्र में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने को भ्रष्ट आचरण माना था।
न्यायालय ने जिला निर्वाचन अधिकारी और राज्य निर्वाचन आयोग को तीन महीने के भीतर वार्ड नंबर-9 में दोबारा चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। साथ ही राजेंद्र सिंह जीना के चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाई गई थी।
अब तीन महीने की समय-सीमा पूरी होने में महज कुछ दिन शेष हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिला न्यायालय ने समय सीमा तय कर दी थी तो वार्ड नंबर-9 में दोबारा चुनाव की तैयारी कहां तक पहुंची?
नगर निगम प्रशासन और जिला निर्वाचन अधिकारी ने अब तक क्या कदम उठाए?
राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से चुनाव को लेकर क्या प्रक्रिया शुरू की गई? और सबसे बड़ा सवाल क्या अदालत के आदेश के बावजूद वार्ड नंबर-9 को लेकर नगर निगम प्रशासन और प्रशासनिक स्तर पर ऐसी खामोशी रहेगी? वार्ड के लोगों के बीच इन सवालों की चर्चा अब तेज हो गई है।
डेढ़ साल तक अदालत में डटे रहे गिरीश नैनवाल
इस पूरे मामले का सबसे अहम चेहरा वार्ड नंबर-9 निवासी गिरीश नैनवाल हैं। राजेंद्र सिंह जीना के निर्वाचन को चुनौती देने के बाद नैनवाल करीब डेढ़ साल तक कानूनी लड़ाई लड़ते रहे।
यह कोई एक-दो दिन की राजनीतिक बयानबाजी नहीं थी। नैनवाल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना किया और आखिरकार जिला न्यायालय से अपने पक्ष में फैसला हासिल किया।
अदालत के फैसले ने न केवल राजेंद्र जीना का निर्वाचन निरस्त किया, बल्कि वार्ड नंबर-9 में दोबारा चुनाव कराने का रास्ता भी खोल दिया।
लेकिन हैरानी यह है कि जिस व्यक्ति ने डेढ़ साल तक यह कानूनी लड़ाई लड़ी, उसकी जीत के बाद राजनीतिक तौर पर वही उत्साह दिखाई नहीं दिया जिसकी उम्मीद भाजपा से जुड़े एक नेता के तौर पर गिरीश नैनवाल को हो सकती थी।
कांग्रेस के खिलाफ जरा-जरा सी बात पर सक्रिय भाजपा, अपने ही नेता की जीत पर चुप क्यों?
गिरीश नैनवाल भाजपा से जुड़े नेता हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कांग्रेस से जुड़े राजेंद्र सिंह जीना के निर्वाचन के खिलाफ इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर फैसला हासिल करने वाले नैनवाल की जीत पर नैनीताल भाजपा संगठन आखिर खामोश क्यों रहा?
कांग्रेस के खिलाफ छोटी-बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों पर उत्साह दिखाने और कई बार जश्न मनाने वाले संगठन के बड़े नेताओं की ओर से नैनवाल की इस कानूनी जीत को लेकर वैसी सक्रियता क्यों नहीं दिखाई दी?
क्या यह सिर्फ संयोग है? या फिर वार्ड नंबर-9 की राजनीति में कुछ ऐसा है, जिसे संगठन सार्वजनिक नहीं करना चाहता?
सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं थी। यह चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और अदालत के आदेश से जुड़ा मामला बन चुका है।
मेयर गजराज सिंह बिष्ट की मौजूदगी भी चर्चा में
इस कहानी का एक और दिलचस्प पहलू है। मौजूदा मेयर गजराज सिंह बिष्ट चुनाव से पहले वार्ड नंबर-9 में गिरीश नैनवाल द्वारा आयोजित मुखानी क्षेत्र में चुनावी सभा में मौजूद रहे थे।
यानी चुनाव के वक्त पार्टी के प्रत्याशी के समर्थन में मंच साझा करने वाले पार्टी के वरिष्ठ नेता और आज नगर निगम की मेयर कुर्सी पर बैठे गजराज सिंह बिष्ट, अदालत में गिरीश नैनवाल की लंबी कानूनी लड़ाई और जीत के बाद कितने सक्रिय दिखाई दिए यह सवाल अब वार्ड की राजनीतिक चर्चाओं में उठ रहा है।
क्या चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए?
क्या गिरीश नैनवाल की कानूनी जीत संगठन के लिए राजनीतिक रूप से असहज सवाल बन गई? या फिर भाजपा संगठन इस पूरे मामले को सिर्फ अदालत की प्रक्रिया मानकर उससे दूरी बनाए हुए है?
जिलाध्यक्ष और मेयर से संपर्क का दावा
सूत्रों के अनुसार, गिरीश नैनवाल ने इस मामले को लेकर भाजपा जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट और मेयर गजराज सिंह बिष्ट से कई बार संपर्क किया। बताया जाता है कि उन्होंने प्रशासन को अदालत के आदेश की याद दिलाने, वार्ड नंबर-9 में चुनाव प्रक्रिया जल्द शुरू कराने और इस मामले में संगठन की ओर से आवाज उठाने की अपील भी की।
इतना ही नहीं सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि कांग्रेस पृष्ठभूमि के राजेंद्र सिंह जीना की भी इस मामले भाजपा जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट और मेयर गजराज सिंह बिष्ट से मुलाकात हुई है। हालांकि सूत्रों के इन दावों पर भाजपा जिलाध्यक्ष और मेयर का आधिकारिक पक्ष अभी सामने नहीं आया है।
करीब डेढ़ साल तक चुनावी प्रक्रिया को लेकर अदालत में डटे रहे गिरीश नैनवाल की कानूनी जीत के बाद अब वार्ड नंबर-9 के लोगों की निगाहें सिर्फ अदालत पर नहीं, बल्कि जिला निर्वाचन अधिकारी, राज्य निर्वाचन आयोग और हल्द्वानी नगर निगम प्रशासन पर भी हैं।
जिला न्यायालय ने तीन महीने के भीतर दोबारा चुनाव कराने का निर्देश दिया था। समय-सीमा अब खत्म होने के करीब है। हाईकोर्ट ने भी राजेंद्र जीना को फिलहाल कोई अंतरिम राहत नहीं दी है।
ऐसे में वार्ड नंबर-9 अब एक सीधा सवाल पूछ रहा है कि जब अदालत ने फैसला सुना दिया, तो चुनाव कराने वाले कब जागेंगे?
डेढ़ साल तक अदालत में लड़ाई लड़कर चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता का सवाल उठाने वाले गिरीश नैनवाल की जीत के बाद अब देखना यह है कि प्रशासन अदालत के आदेश को कितनी गंभीरता से लेता है और वार्ड नंबर-9 के लोगों को दोबारा मतदान का अधिकार कब मिलता है।
फिलहाल मामला हाईकोर्ट में लंबित है और अगली सुनवाई एक अक्टूबर 2026 को होनी है। लेकिन उससे पहले एक बात साफ है वार्ड नंबर-9 की कानूनी लड़ाई भले अदालत में लड़ी गई हो, अब उसकी अगली परीक्षा प्रशासन और राजनीतिक संगठनों की कार्यशैली की होने वाली है।










