
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। किशोर उम्र की दहलीज पर खड़ी एक बच्ची… सपनों, पढ़ाई और भरोसे से भरी हुई। लेकिन जब निगरानी ढीली पड़ जाए, संवाद टूट जाए और समाज आंखें मूंद ले, तो यही मासूम कदम भटक कर खतरनाक अंधेरों में जा गिरते हैं।
हल्द्वानी की यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि उस सामूहिक असफलता का आईना है, जिसमें माता-पिता की परवरिश, समाज की चुप्पी और पुलिस की निष्क्रियता तीनों कठघरे में खड़ी दिखाई देती हैं।
सवाल सीधा है क्या मां-बाप की ज़िम्मेदारी सिर्फ बच्चे पैदा करने तक सीमित है, या उनकी दिनचर्या, संगत और गतिविधियों पर नज़र रखना भी उतना ही जरूरी है?
काठगोदाम थाना क्षेत्र के एक मोहल्ले की 15 वर्षीय किशोरी, जो दसवीं की छात्रा है, मंगलवार शाम करीब साढ़े छह बजे घर के पास दुकान से सामान लेने निकली थी। यहीं उसकी मुलाकात घर के बगल में किराये पर रह रहे अल्मोड़ा जिले के दन्या थाना क्षेत्र के नौगांव निवासी मोहित (20) और प्रदीप (24) से हुई। दोनों ने उसे घुमाने के बहाने कार में बैठाया और हैड़ाखान मार्ग की ओर ले गए।
रास्ते में कार के भीतर किशोरी को शराब पिलाई गई और फिर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। यह वही सड़क है जो लंबे समय से भटके युवाओं का “फेवरेट ठिकाना” बनी हुई है जहां सुबह से लेकर देर शाम तक युवक-युवतियों का जमावड़ा, नशा और अनैतिक गतिविधियां आम बात हो चुकी हैं।
देर रात साढ़े दस बजे तक बेटी के घर न लौटने पर परिजन घबरा गए और काठगोदाम थाना पहुंचे। पुलिस के साथ खोजबीन शुरू हुई तो हैड़ाखान सड़क पर एक कार खड़ी मिली। कार के भीतर किशोरी बेहोशी की हालत में पाई गई, जबकि दोनों आरोपी वहीं मौजूद थे। मेडिकल जांच के बाद किशोरी को परिजनों के सुपुर्द किया गया और दोनों युवकों के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
एसपी सिटी मनोज कुमार कत्याल के अनुसार, नाबालिग से दुष्कर्म की पुष्टि के बाद दोनों आरोपियों को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। घटना में प्रयुक्त कार को भी सीज कर दिया गया है।
यहां सवाल सिर्फ अपराधी मानसिकता का नहीं है। सवाल यह भी है कि एक 10वीं की छात्रा आखिर इन युवकों के साथ कार में क्यों गई? क्या उनके बीच पहले से पहचान थी? यदि हां, तो परिवार को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या हम बच्चों की पढ़ाई पर तो जोर देते हैं, लेकिन उनकी दोस्ती, मोबाइल, आवाजाही और मनोस्थिति पर बातचीत करना भूल चुके हैं?
और उससे भी बड़ा सवाल हैड़ाखान मार्ग जैसे इलाकों में खुलेआम चल रही संदिग्ध गतिविधियों से क्या पुलिस वाकई अनजान है? स्थानीय लोग जानते हैं, राहगीर जानते हैं, लेकिन कार्रवाई अक्सर किसी बड़ी वारदात के बाद ही क्यों होती है? क्या पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ एफआईआर दर्ज करने तक सीमित रह गई है?
यह घटना एक चेतावनी है माता-पिता के लिए भी, समाज के लिए भी और पुलिस तंत्र के लिए भी। बच्चों के भटकते कदम सिर्फ उनकी भूल नहीं होते, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही का नतीजा होते हैं। जब तक परवरिश में संवाद, निगरानी और जिम्मेदारी नहीं आएगी, और जब तक ऐसे “खुले ठिकानों” पर सख्ती नहीं होगी, तब तक हर ऐसी खबर सिर्फ अपराध की नहीं, बल्कि हमारी चुप्पी की कहानी बनती रहेगी।









