श्रद्धांजलि: सर… सबकी खबर संभालते रहे, अपनी जिंदगी की खबर अधूरी छोड़ गए

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हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। कुछ खबरें सिर्फ खबरें नहीं होतीं, कुछ खबरें भीतर तक तोड़ देती हैं। आज जिला सूचना अधिकारी नैनीताल गिरिजा शंकर जोशी सर के असमय निधन की खबर लिखते हुए मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कलम हाथ में है, शब्द सामने हैं, लेकिन मन बार-बार यही कह रहा है सर, आप इतनी जल्दी कैसे चले गए?

अभी तो कल ही आपने एक खबर भेजी थी और हमेशा की तरह कहा था, भाई, इसे पोर्टल में चला दो। और आज वही भाई आपके लिए श्रद्धांजलि लिख रहा है। उससे चार दिन पहले शाम को भी आपका फोन आया था। आवाज में दर्द साफ महसूस हो रहा था। आपने कहा था, पाठक जी, बहुत थकान हो रही है, सिरदर्द है, एक खबर भेजी है थोड़ा देख दो। तब कहां पता था कि आपकी आवाज में महसूस हुआ वह दर्द आने वाले किसी बड़े दुख का संकेत है।

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काश, उस दिन समझ पाता कि आप कितनी पीड़ा में थे। काश, उस दिन आपसे कह पाता कि सर, आज काम रहने दीजिए, पहले आराम कर लीजिए। लेकिन जिंदगी किसी को इतना अवसर कहां देती है कि वह अपनी आखिरी मुलाकात या आखिरी बातचीत पहचान सके।

गिरिजा शंकर जोशी मेरे लिए सिर्फ जिला सूचना अधिकारी नहीं थे। वह मेरे लिए एक बड़े भाई जैसे थे। मुझे भी छोटा भाई कहते थे और उनके मुंह से निकला वह “भाई” सिर्फ मतलबी संबोधन नहीं था, उसमें एक अलग तरह का अपनापन, भरोसा और आत्मीयता थी। हल्द्वानी में करीब डेढ़ साल के उनके कार्यकाल में हफ्ते में बहुत कम दिन रहे, जब उनसे मुलाकात न हुई हो। मीडिया सेंटर में उनकी मौजूदगी ही पत्रकारों के बीच सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती थी।

दिल और दिमाग में काम का कितना भी दबाव हो, सामने आने वाले हर व्यक्ति से प्यारी सी मुस्कान और आत्मीयता से मिलना उनकी आदत थी। मुझे याद नहीं आता कि उन्होंने कभी किसी पत्रकार के साथ ऐसा व्यवहार किया हो, जिससे उसे रत्ती भर भी दुख पहुंचा हो। पत्रकार वरिष्ठ हो या जूनियर, नया हो या पुराना, उनकी नजर में सब भाई थे।

बिना किसी लागलपेट और भेदभाव के सबसे मिलना, सबकी बात सुनना और अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करना उनके स्वभाव में था। आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो समझ आ रहा है कि किसी पद पर रहते हुए लोगों के दिल में जगह बनाना शायद किसी भी अधिकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है और जोशी सर यह उपलब्धि अपने पीछे छोड़ गए हैं।

जोशी सर के लिए काम सिर्फ नौकरी नहीं था, वह जिम्मेदारी थी और शायद जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी थी। वह अक्सर अपनी पीड़ा साझा करते थे। बताते थे कि सुबह सात-आठ बजे से अखबारों की कटिंग निकालकर शासन-प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को भेजने का काम शुरू हो जाता है। इसके बाद दिनभर जिलेभर के कार्यक्रम, बैठकों और विभागीय गतिविधियों से जुड़े प्रेसनोट तैयार करने का सिलसिला चलता रहता है।

मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी और तमाम सरकारी विभागों से जुड़ी खबरों में कोई गलती न रह जाए और खबर बेहतर तरीके से जाए, यही उनकी प्राथमिकता रहती थी। कई बार कहते थे कि यहां इतने कर्मचारी हैं, लेकिन ढंग का प्रेसनोट कोई बना तो दे। यानी छोटी खबर हो या बड़ी, अंततः जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ जाती थी।

कुछ समय से उन्होंने मीडिया सेंटर के कुछ कर्मचारियों को भी प्रेसनोट तैयार करने की जिम्मेदारी देना शुरू किया था, ताकि काम का बोझ थोड़ा बंटे और कर्मचारी भी कुशल बनें, लेकिन उनके पास जो भी सामग्री आती, वह उसे अक्षर-अक्षर पढ़ते, सुधारते और फिर अंतिम रूप देते। हफ्ते में तीन दिन नैनीताल और तीन दिन हल्द्वानी मीडिया सेंटर में बैठकर काम करना और इस दौरान हर दिन उन्हें खबरों से जूझते देखना मेरे लिए सामान्य दृश्य बन चुका था।

कई बार मन में सवाल आता था कि जब अधिकतर लोग दस से पांच की ड्यूटी करके घर चले जाते हैं तो जोशी सर सुबह से देर रात तक खबरों से क्यों जूझते रहते हैं। जिला सूचना अधिकारी जैसा महत्वपूर्ण पद और काम में हाथ बंटाने वाला कोई पर्याप्त जिम्मेदार सहयोगी तक नहीं। फिर भी शिकायत कम और काम ज्यादा।

घर से सुबह जो टिफिन लेकर आते थे, उसे कई बार शाम के पांच-छह बजे तक खाते देखा। लेकिन उस टिफिन की भी एक खासियत थी, वह सिर्फ उनका नहीं था। पत्रकार साथी हों या सहकर्मी, जो भी पास बैठा हो, उनके खाने में उसका भी हिस्सा होता था।

शायद ही कभी ऐसा रहा हो जब उन्होंने पत्रकारों और सहकर्मियों के साथ अपना टिफिन साझा न किया हो। यही तो जोशी सर थे, सरल, सहज और दिल खोलकर अपनापन बांटने वाले। पिछले दिनों जब दो पत्रकार साथियों (बनभूलपुरा और राजपुरा में) ने अपने अपनों को खोया, दोनों जगह मैं उनके साथ था। एक जगह तो वह मेरी बाइक पर बैठकर ही गए थे।

जिस दौर में सरकारी वाहन को कई अधिकारी कर्मचारी अपनी सुविधा का साधन मान लेते हैं, उस दौर में जोशी सर की सादगी भी अपने आप में एक मिसाल थी। जिस दिन जिलाधिकारी की ओर से सप्ताह में एक दिन सार्वजनिक वाहन का उपयोग करने के निर्देश हुए, उसी दिन से उन्होंने बाइक से आना-जाना शुरू कर दिया। शाम पांच बजे के बाद सरकारी गाड़ी का बहुत कम इस्तेमाल करते थे।

कई बार पत्रकार साथियों से मुस्कुराते हुए कहते थे, घर छोड़ दोगे क्या भाई, मुझे भी… और कोई उनसे मना करने की बात सोच भी नहीं सकता था। उन्हें घर तक छोड़ना भी अपनेपन का सुख था। सरकारी अफसर बहुत देखे, लेकिन अपने काम के प्रति इतनी ईमानदारी और समर्पण वाला अधिकारी बहुत कम देखा।

मुझे आज भी वह दिन याद है, जब उन्हें किसी पारिवारिक काम से अपने पैतृक घर जाना था और छुट्टी के लिए उन्होंने जिलाधिकारी के नाम आवेदन बनाया था। संयोग से मैं भी उसी समय जिलाधिकारी को अपने अखबार का अंक देने गया था। सामने जिलाधिकारी थे, दूसरी तरफ जोशी सर और मैं। जैसे ही उन्होंने छुट्टी का आवेदन सामने रखा तो सुनाई पड़ा, मैं देख रहा हूं, तुम छुट्टी बहुत ले रहे हो।

जोशी सर ने सहजता से कहा, नहीं सर, मैंने पिछले तीन साल से कोई छुट्टी नहीं ली है। बीच में देहरादून भी विभागीय काम से गया था। आप चेक कर लीजिए मेरे आवेदन। मैं सामने खड़ा एक ऐसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी को एक दिन की छुट्टी पाने के लिए अपनी ईमानदारी का हिसाब देते देख रहा था, जिसने खुद शायद ही कभी छुट्टी ली हो। बाद में उन्हें इस शर्त पर छुट्टी मिली कि खबरों का काम प्रभावित न हो।

बाहर आए तो मैंने भी कहा, गजब हाल है सर… वह बुझे बुझे से मुस्कुराए और बोले, देखा आपने, एक छुट्टी के लिए कितना सुनना पड़ रहा है, जबकि मैं कभी छुट्टी लेता तक नहीं। आज सोचता हूं, काश उस दिन किसी ने उनकी छुट्टी की जरूरत के साथ-साथ उनकी थकान भी पढ़ ली होती।

जोशी सर गर्दन, कंधे और कमर के दर्द से भी जूझ रहे थे। गले में पट्टा देखा, कमर पर बेल्ट देखा, उनकी पीड़ा भी सुनी, लेकिन काम कभी नहीं रुका। सुबह सात बजे से रात 11-12 बजे तक सरकारी प्रेसनोट, अधिकारियों की बैठकें, सूचनाएं और दूसरे विभागीय कामों से जूझते रहे। शायद वह अपनी जिम्मेदारी को जरूरत से ज्यादा गंभीरता से लेते थे।

शायद कर्तव्य के प्रति जरूरत से ज्यादा ईमानदार थे। और आज उनके जाने के बाद यही बात सबसे ज्यादा भीतर तक चुभ रही है कि क्या एक कर्मचारी की कर्तव्यनिष्ठा की भी कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? क्या किसी व्यवस्था की यह जिम्मेदारी नहीं कि जो व्यक्ति वर्षों तक पूरी ईमानदारी से व्यवस्था का काम करता रहा, उसकी सेहत और उसके परिवार की चिंता भी की जाए?

मैं किसी पर आरोप नहीं लगा रहा, लेकिन एक ऐसे इंसान को अपनी आंखों के सामने दिन-रात काम करते देखने के बाद उसके असमय चले जाने पर मन में ये सवाल उठना स्वाभाविक है। कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि जोशी सर अपनी जरूरत से ज्यादा ईमानदारी और जिम्मेदारी की कीमत चुका गए।

जोशी सर अपने परिवार से बहुत प्यार करते थे। शाम को कई बार दूध, पनीर, सब्जी और घर का राशन लेकर जाते थे। एक दिन मुझसे बोले, आप राशन कहां से लेते हो, चलो आज मैं दिखाता हूं बढ़िया दुकान। कितनी साधारण सी बात थी, लेकिन आज वही बात याद आती है तो आंखें भर आती हैं। हल्द्वानी में घर बनाने का सपना था उनका। कुछ समय बाद पदोन्नति की उम्मीद थी।

परिवार के लिए आगे बहुत कुछ करना था। दो छोटे बच्चे थे, धर्मपत्नी थीं, कितने सपने रहे होंगे, कितनी योजनाएं रही होंगी, लेकिन जिंदगी ने बीच रास्ते में ही सब रोक दिया। जिस इंसान को अपने बच्चों के लिए जरूरी सामान लेकर घर लौटना था, जिस इंसान को अपना घर बनाना था, जिस इंसान को परिवार के भविष्य की चिंता करनी थी, वह आज अचानक हम सबको छोड़कर चला गया।

जिले से लेकर प्रदेश तक न जाने कितने अधिकारियों, राजनेताओं और सरकारी योजनाओं से जुड़ी खबरों को जनता तक पहुंचाने के लिए जोशी सर ने दिन-रात काम किया। किसी की बैठक छूट न जाए, किसी की खबर गलत न चली जाए, किसी विभाग का प्रेसनोट समय पर न रुके, उन्होंने कभी घड़ी नहीं देखी। उन्होंने सिर्फ अपना काम देखा।

आज जब वह नहीं हैं तो मन में एक सवाल उठ रहा है कि जिस अधिकारी ने पूरी जिंदगी व्यवस्था के काम को अपना काम समझकर निभाया, क्या अब व्यवस्था उनके परिवार को अपना परिवार समझेगी? क्या उनके दोनों मासूम बच्चों और धर्मपत्नी के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कोई ठोस पहल होगी?

क्या किसी को यह महसूस होगा कि हमने सिर्फ एक जिला सूचना अधिकारी नहीं खोया, बल्कि ऐसा कर्मचारी खोया है जिसने अपनी जिम्मेदारी निभाते-निभाते खुद को खपा दिया?

सर, आपके साथ जुड़ी बहुत सी बातें हैं। किस-किस को याद करूं और किस-किस को लिखूं, समझ नहीं आ रहा। आपकी मुस्कान याद आती है, आपका भाई और पाठक जी कहकर बुलाना याद आता है, आपका टिफिन याद आता है, बाइक से घर जाना याद आता है, खबर भेजकर कहना याद आता है भाई, इसे चला दो। चार दिन पहले फोन पर आपकी दर्द में डूबी आवाज याद आती है पाठक जी, बहुत सरदर्द हो रहा है…आज समझ आ रहा है कि कुछ आवाजें फोन कटने के बाद भी हमेशा हमारे भीतर बजती रहती हैं।

मीडिया सेंटर में आपकी कुर्सी होगी, फाइलें होंगी, प्रेसनोट होंगे, लेकिन आप नहीं होंगे। शायद किसी दिन वहां जाना भी मुश्किल लगेगा, क्योंकि हर कोने से आपकी आवाज सुनाई देगी और हम मुड़कर देखेंगे, लेकिन आप वहां नहीं होंगे।

अभी मैं माउंट आबू में हूं। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के परिसर में आयोजित मीडिया सम्मेलन के बीच बैठा हूं। आसपास आध्यात्मिकता है, ध्यान है, शांति है, लेकिन मन के भीतर बहुत कुछ टूट रहा है।

ध्यान योग कक्ष में बैठकर यह सब लिखते हुए लग रहा है कि एक कलम के सिपाही को श्रद्धांजलि देने के लिए मेरे पास कलम के अलावा कुछ है ही नहीं। आपने जिंदगी भर खबरें लिखवाने, बनवाने और लोगों तक पहुंचाने का काम किया।

आज आपकी खबर लिखते हुए मेरी कलम बार-बार रुक रही है। आंखें नम हैं और मन में बस एक ही सवाल है क्या कर्म और दायित्व के प्रति इतना ईमानदार, इतना समर्पित और इतना नेक इंसान भी इतनी जल्दी हमसे दूर जाने के लिए बना था?

काश, आपने कभी अपने लिए भी छुट्टी ली होती। काश, किसी ने आपको रोककर कहा होता सर, आज रहने दीजिए, पहले आराम कर लीजिए।

काश, किसी ने आपकी मुस्कुराहट के पीछे छिपा दर्द पढ़ लिया होता। लेकिन अब काश से क्या होगा। आप वहां चले गए हैं, जहां से कोई वापस नहीं आता। पीछे रह गई हैं आपकी यादें, आपका परिवार, आपके दो मासूम बच्चे, धर्मपत्नी और वे तमाम लोग, जिन्हें आपने अपना समझा। आपकी कुर्सी खाली हो गई है, लेकिन हमारे दिलों में आपकी जगह कभी खाली नहीं होगी।

गिरिजा शंकर जोशी सर, आप मेरे लिए हमेशा जिला सूचना अधिकारी नहीं रहेंगे। आप मेरे बड़े भाई रहेंगे। और एक छोटे भाई के मन में अपने बड़े भाई के लिए इससे ज्यादा और क्या हो सकता है कि वह आखिरी बार बस इतना कहे सर, आप बहुत याद आएंगे… बहुत ज्यादा। परमात्मा आपकी आत्मा को शांति दे।

आपकी धर्मपत्नी और आपके दोनों मासूम बच्चों को यह असीम दुख सहने की शक्ति दे। और जिस व्यवस्था के लिए आपने अपनी जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा समर्पित कर दिया, वह आपके जाने के बाद आपके परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी उतनी ही ईमानदारी से निभाए, जितनी ईमानदारी से आपने अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।

अलविदा सर… आपकी आवाज अब शायद फिर कभी सुनाई नहीं दे, लेकिन आपकी याद हमारे भीतर हमेशा जिंदा रहेगी। आप जहां रहें सुख शांति से भरपूर रहें, परमात्मा शिव से यही प्रार्थना है।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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