
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। शहर में सीवर और सड़क निर्माण के नाम पर खोदी गई सड़कों का दर्द अब आमजन की जिंदगी पर भारी पड़ने लगा है।
रविवार दोपहर घटा यह कोई सड़क हादसा नहीं था, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से रची गई एक खामोश हत्या थी। सीवर और सड़क निर्माण के नाम पर शहर को गड्ढों में तब्दील कर देने वाली व्यवस्था ने रविवार को एक और जिंदगी छीन ली। खुले सीवर चैम्बर, बिना चेतावनी बोर्ड और शून्य सुरक्षा इंतजाम इन सबका खामियाजा एक बुजुर्ग को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा।
यह हृदयविदारक घटना पनचक्की चौराहे से मुखानी चौराहे को जोड़ने वाली सड़क पर, अंबिका विहार जाने वाली गली के पास हुई। शांति विहार पनचक्की निवासी 70 वर्षीय सुरेश चंद्र पांडे स्कूटी से गुजर रहे थे। सड़क पर खोदे गए सीवर गड्ढे ने उनकी स्कूटी को असंतुलित कर दिया। वह सड़क पर गिरे और तभी तेज रफ्तार ट्रक की चपेट में आ गए। कुछ ही पलों में एक घर का सहारा, एक परिवार की ढाल और एक नागरिक की सांसें छिन गईं।
हैरानी की बात यह है कि यह मार्ग कोई सुनसान रास्ता नहीं, बल्कि रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही वाला इलाका है। इसके बावजूद महीनों से सड़क उधड़ी पड़ी है। न बैरिकेडिंग, न रेडियम संकेत, न चेतावनी बोर्ड मानो दुर्घटना को न्योता दिया जा रहा हो।
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कानूनी औपचारिकताएं ही काफी हैं? घटना के बाद स्थानीय लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। लोगों ने साफ शब्दों में कहा कि यह हादसा नहीं, बल्कि प्रशासन और निर्माण एजेंसियों की घोर लापरवाही से की गई हत्या है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर समय रहते गड्ढों को ढक दिया गया होता, सीवर चैम्बरों को सुरक्षित किया गया होता और सड़क को चलने लायक छोड़ा गया होता, तो आज एक बुजुर्ग जिंदा होते। यह घटना नगर की अव्यवस्थित कार्यप्रणाली और जनसुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता का जीता-जागता सबूत है।
अब सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है, सवाल यह है कि अगली बारी किसकी है? अभी कुछ दिन पहले ही मुखानी नहर कवरिंग रोड पर एक किशोर की जिंदगी भी ऐसे ही एक गड्ढे के चलते खामोश हुई थी। तब भी अधिकारियों का कैमरा, एक्शन वाला मौका मुआयना कार्यक्रम चला था। लेकिन शहर के हालात फिर भी नहीं सुधरे। वही ढाक के तीन पात जैसा हाल। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि क्या प्रशासन इस मौत की जिम्मेदारी तय करेगा, या फिर हर बार की तरह इसे भी “दुर्घटना” कहकर फाइलों में दफना दिया जाएगा?









