
नई दिल्ली/डीडीहाट, प्रेस 15 न्यूज। उत्तराखंड के डीडीहाट की बेटी और सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता मेघा टोलिया की कानूनी लड़ाई का बड़ा असर सामने आया है। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में तीन साल की अनिवार्य वकालत के नियम को लेकर उठाई गई आवाज अब देशभर के कानून छात्रों के लिए बड़ी राहत बन गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपने मई 2025 के फैसले में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए सिविल जज परीक्षा के लिए अनिवार्य वकालत की अवधि तीन साल से घटाकर एक साल कर दी है। यह फैसला देशभर के उन कानून स्नातकों के लिए बेहद अहम है, जो न्यायिक सेवा में अपना करियर बनाना चाहते हैं।
डीडीहाट की मेघा टोलिया ने उठाई थी आवाज
इस पूरे मामले में अधिवक्ता मेघा टोलिया, पुत्री भगत सिंह टोलिया (सेवानिवृत्त डीआईजी) की भूमिका खास रही। उन्होंने अपने पांच साथियों के साथ मिलकर जनहित याचिका के माध्यम से कानून छात्रों और नए लॉ ग्रेजुएट्स की समस्याओं को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा।
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिविल जज परीक्षा से पहले तीन साल की वकालत अनिवार्य किए जाने के बाद देशभर में युवा कानून स्नातकों के बीच चिंता बढ़ी थी। इसी मुद्दे को मेघा टोलिया और उनके साथियों ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस की विशेष पीठ के समक्ष हुई। इसी मुद्दे को लेकर देशभर से बड़ी संख्या में पुनर्विचार याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। बताया गया कि 122 रिव्यू पेटिशन इस मुद्दे पर दाखिल हुईं, जिन्हें मुख्य याचिका के साथ क्लब कर दिया गया।
लंबी सुनवाई और बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था। आखिरकार 21 अगस्त 2026 को शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुना दिया।
तीन साल की शर्त से एक साल तक आया नियम
सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के मुताबिक 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए सिविल जज परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों को एक साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस का प्रमाण देना होगा। यानी मई 2025 में सामने आए तीन साल के नियम को अब घटाकर एक साल कर दिया गया है।
वहीं 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए अभ्यर्थियों को आवेदन करने से पहले किसी पूर्व कानूनी प्रैक्टिस का अनुभव जरूरी नहीं होगा।
चयन के बाद दो साल की ट्रेनिंग
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा में आने वाले नए अधिकारियों के व्यावहारिक अनुभव के लिए दो साल के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी तय की है।
पहला वर्ष: राज्य न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण।
दूसरा वर्ष: एक साल की क्लर्कशिप जिसमें छह महीने जिला एवं सत्र न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी के अधीन और छह महीने हाईकोर्ट के न्यायाधीश के अधीन प्रशिक्षण होगा।
मेघा टोलिया की कानूनी पहल बनी देशभर के युवाओं की राहत
इस फैसले को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह केवल एक नियम में बदलाव नहीं है, बल्कि उन हजारों युवा कानून स्नातकों के लिए राहत है जो सीधे न्यायिक सेवा में जाने का सपना देखते हैं।
डीडीहाट की बेटी मेघा टोलिया ने जिस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया, उस पर देश की सर्वोच्च अदालत में लंबी कानूनी बहस हुई और अब नियम में महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है।
उत्तराखंड के छोटे से पहाड़ी क्षेत्र डीडीहाट से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक कानून छात्रों की आवाज पहुंचाने वाली मेघा टोलिया की यह पहल निश्चित तौर पर प्रदेश के युवाओं के लिए भी प्रेरणादायी है। एक आवाज उठी, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और आज देशभर के हजारों कानून छात्रों के लिए रास्ता कुछ आसान हुआ।









