दुःखद: मालिश से मौत तक… पिथौरागढ़ की 24 साल की मीनाक्षी के साथ हल्द्वानी में आखिर हुआ क्या?

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हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। बीमारी से जूझता आम आदमी आखिर जाए तो जाए कहां? जब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा डगमगाता है, इलाज महंगा लगता है या अस्पतालों के चक्कर काटकर भी राहत नहीं मिलती, तो यही मजबूर इंसान अक्सर उस व्यक्ति के पास पहुंच जाता है, जो कम पैसे में और तुरंत इलाज का भरोसा देता है।

उसे यह नहीं दिखता कि सामने बैठा व्यक्ति कितना योग्य है, उसके पास इलाज की वैध अनुमति है या नहीं। उसे सिर्फ ठीक होने की उम्मीद दिखाई देती है। दुमुवाढूंगा की 24 वर्षीय मीनाक्षी भी इसी उम्मीद में एक झोलाछाप के पास पहुंची थीं। लेकिन यह उम्मीद उनकी जिंदगी के साथ ही खत्म हो गई।

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हल्द्वानी शहर के दुमुवाढूंगा क्षेत्र में रहने वाले पिथौरागढ़ निवासी रामचंद्र की पत्नी मीनाक्षी की गर्दन की मालिश के दौरान मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि कालाढूंगी रोड स्थित एक झोलाछाप के यहां गर्दन की मालिश कराने के बाद उनकी हालत बिगड़ी और देखते ही देखते उनकी मौत हो गई।

रामचंद्र के अनुसार, उनकी पत्नी पिछले चार-पांच माह से गर्दन में दर्द की शिकायत से परेशान थीं। उनका सुशीला तिवारी अस्पताल में इलाज भी चल रहा था। शनिवार को लोगों के कहने पर वह पत्नी को कालाढूंगी रोड स्थित पहलवान के यहां लेकर पहुंचे। परिजनों का आरोप है कि गर्दन की मालिश करने के बाद मीनाक्षी की गर्दन को जोर से हिलाया गया। इसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

परिजन उन्हें बेस अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। रामचंद्र निजी नौकरी करते हैं। उनके पीछे दो छोटे बच्चे हैं। परिवार में मौत के बाद कोहराम मचा हुआ है। पुलिस ने परिजनों से घटना की जानकारी लेकर जांच शुरू कर दी है।

मौत के बाद क्यों जागता है तंत्र?

इस घटना ने सिर्फ एक परिवार को नहीं झकझोरा, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के पास इलाज कराने लोग पहुंच रहे थे, उसकी गतिविधियों पर स्वास्थ्य विभाग की नजर पहले क्यों नहीं पड़ी?

मीनाक्षी की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और सीएमओ डॉ. रश्मि पंत आनन-फानन में मौके पर पहुंचीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की निगरानी व्यवस्था को किसी की जान जाने का इंतजार रहता है?

झोलाछापों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें अक्सर तब सामने आती हैं, जब कोई गंभीर घटना हो चुकी होती है। इससे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे लोगों की पहचान और जांच पहले क्यों नहीं होती? क्या स्वास्थ्य विभाग के पास क्षेत्र में चल रहे ऐसे इलाज केंद्रों की जानकारी नहीं होती?

मजबूरी का फायदा कौन उठा रहा है?

यह भी समझना जरूरी है कि कोई व्यक्ति अपनी जान जोखिम में डालकर झोलाछाप के पास क्यों जाता है। आम आदमी इलाज चाहता है, राहत चाहता है और अपने परिवार के सदस्य को स्वस्थ देखना चाहता है। जब उसे लगता है कि कहीं से राहत नहीं मिल रही, तब वह किसी के बताए ऐसे व्यक्ति के पास पहुंच जाता है, जो इलाज का भरोसा देता है।

मीनाक्षी भी इलाज और राहत की उम्मीद लेकर ही गई थीं। उन्हें क्या पता था कि गर्दन की मालिश की यह कोशिश उनकी जिंदगी की आखिरी कोशिश बन जाएगी।

यह घटना स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन और समाज—तीनों के सामने एक गंभीर सवाल छोड़ गई है। क्या कार्रवाई मौत के बाद ही होगी या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से निगरानी और कार्रवाई का कोई प्रभावी तंत्र भी बनाया जाएगा?

मीनाक्षी अब नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत के बाद उठे ये सवाल सिर्फ एक परिवार के सवाल नहीं हैं। ये उन तमाम आम लोगों के सवाल हैं, जो बीमारी में इलाज की तलाश में कभी अस्पताल, कभी निजी क्लीनिक और कभी मजबूरी में नीम-हकीम के दरवाजे तक पहुंच जाते हैं।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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