हल्द्वानी: यात्रियों की सुरक्षा नहीं, वाहन मालिकों के शोषण वाला पैनिक बटन और जीपीएस सिस्टम

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हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2019 के आसपास यात्रियों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के उद्देश्य से वाहनों में पैनिक बटन और जीपीएस सिस्टम को अनिवार्य किया गया था। सरकार की मंशा निस्संदेह सराहनीय थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट साबित हुई है। आज यह व्यवस्था सुरक्षा का माध्यम न होकर वाहन मालिकों और चालकों के शोषण का कारण बन चुकी है।

कुमाऊं टैक्सी महासंघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मनोज भट्ट ने कहा कि बीते लगभग छह वर्षों में सरकार और परिवहन विभाग ने केवल आदेश तो जारी किए, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की। न तो आज तक राज्य में कोई पूर्ण रूप से कार्यशील कंट्रोल रूम स्थापित किया गया और न ही जीपीएस संचालन के लिए किसी स्थायी, जिम्मेदार और भरोसेमंद संस्था को अधिकृत किया गया।

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उन्होंने बताया कि हर साल कोई न कोई नई कंपनी जीपीएस लगाने का काम शुरू कर देती है। एक-दो वर्ष बाद वही कंपनी बाजार से गायब हो जाती है। जब वाहन मालिक रिचार्ज, मेंटेनेंस या सर्विस के लिए संपर्क करता है, तो कंपनी का कोई अता-पता नहीं मिलता। इस पर अधिकारी केवल इतना कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि “कंपनी की सिक्योरिटी ज़ब्त कर ली गई है।”

कुमाऊं टैक्सी महासंघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मनोज भट्ट।

मनोज भट्ट ने सवाल उठाया कि सिक्योरिटी ज़ब्त होने से वाहन मालिक को क्या लाभ मिला? उसे तो मजबूरी में दोबारा नया जीपीएस लगवाना पड़ता है और इस तरह वह बार-बार आर्थिक शोषण का शिकार होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी परिवहन कार्यालय में आज तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जीपीएस की वास्तविक दरें क्या हैं, कौन-कौन सी कंपनियाँ अधिकृत हैं और शिकायत की स्थिति में किससे संपर्क किया जाए। न तो रेट लिस्ट लगाई जाती है और न ही अधिकृत कंपनियों की सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाती है। जब वाहन मालिक या चालक जानकारी मांगता है तो केवल मौखिक रूप से कहा जाता है—“वेबसाइट पर देख लीजिए।”

मनोज भट्ट ने कहा कि यह व्यवस्था ज़मीनी हकीकत से बिल्कुल कटे हुए है, क्योंकि अधिकांश वाहन चालक और मालिक कम पढ़े-लिखे हैं और वेबसाइट तक पहुँचने में असमर्थ हैं। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर बिचौलिये और एजेंट खुलेआम मनमानी वसूली कर रहे हैं।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज पैनिक बटन और जीपीएस सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि वाहन मालिकों के शोषण का माध्यम बन चुका है।

कुमाऊं टैक्सी महासंघ की ओर से माननीय मुख्यमंत्री से तीन प्रमुख माँगें रखी गई हैं।

पहली, परिवहन विभाग को पैनिक बटन और जीपीएस को लेकर तुरंत एक ठोस, पारदर्शी और स्थायी नीति बनाने के निर्देश दिए जाएँ।

दूसरी, जब तक राज्यभर में पूर्ण रूप से कार्यशील कंट्रोल रूम स्थापित नहीं हो जाता, तब तक पैनिक बटन की अनिवार्यता को स्थगित किया जाए।

तीसरी, जीपीएस से संबंधित दरें, अधिकृत कंपनियों की सूची और शिकायत निवारण प्रणाली को हर परिवहन कार्यालय में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाए।

मनोज भट्ट ने कहा कि टैक्सी महासंघ सुरक्षा के विरोध में नहीं है, लेकिन शोषण के नाम पर सुरक्षा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जब तक व्यवस्थाएँ दुरुस्त नहीं होतीं, तब तक पैनिक बटन केवल नाम का रहेगा—एक शोपीस, जिसका सारा बोझ वाहन मालिकों और चालकों को ही उठाना पड़ेगा।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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