
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। आज का छात्र ही कल का समाज और राष्ट्र गढ़ता है। ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री या रोजगार तक सीमित न रहकर नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं के विकास तक विस्तृत होना चाहिए। इसी विचार को केंद्र में रखकर International Journal of Arts & Education Research में प्रकाशित एक विस्तृत शोध में सामाजिक कार्य शिक्षा की भूमिका को गहराई से विश्लेषित किया गया है।
यह शोध विजय सिंह रौतेला (शोध छात्र, यूनिवर्सिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) द्वारा किया गया है, जबकि इसका मार्गदर्शन डॉ. तुषि सिंह ने किया। शोध का केंद्रीय विषय है छात्रों के नैतिक मूल्यों एवं जीवन लक्ष्यों की प्राप्ति में सामाजिक कार्य शिक्षा का महत्व और भूमिका।
शोध में स्पष्ट किया गया है कि यदि भारत को ज्ञान-आधारित समाज के रूप में विकसित करना है, तो उच्च शिक्षा को एक शक्तिशाली सामाजिक उपकरण के रूप में उपयोग करना होगा। सामाजिक कार्य शिक्षा छात्रों में समाज को समझने, समस्याओं को पहचानने, उनका विश्लेषण करने और समाधान की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने की क्षमता विकसित करती है।
यह अध्ययन सामाजिक कार्य को केवल सेवा नहीं, बल्कि व्यवहारिक ज्ञान, सामाजिक दृष्टिकोण और नैतिक प्रतिबद्धता का संगम मानता है। सामाजिक कार्य शिक्षा छात्रों को समाज के साथ जुड़कर सीखने, समानता को पहचानने और सामाजिक परिवर्तन के वाहक बनने के लिए प्रेरित करती है।
शोध के अनुसार भारतीय शिक्षा प्रणाली का एक प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय विकास में योगदान देना है। स्वतंत्रता के बाद भारत में उच्च शिक्षा का तेज़ी से विस्तार हुआ और यह विश्व की सबसे बड़ी प्रणालियों में शामिल हो गई। इसके साथ ही शिक्षा में समानता, पहुंच, गुणवत्ता, नैतिकता और संस्थागत मूल्यांकन जैसे मुद्दे भी सामने आए।
ज्ञान-आधारित सूचना समाज के निर्माण के लिए उच्च शिक्षा को केंद्रीय भूमिका निभानी होगी। यह बात शोध में विशेष रूप से रेखांकित की गई है।
शोध में बताया गया है कि सामाजिक कार्य शिक्षा विश्व में 100 वर्षों से अधिक पुरानी है। भारत में इसने 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं और 2012 में इसकी प्लेटिनम जयंती मनाई गई। इसके बावजूद सामाजिक कार्य शिक्षा का ज्ञान आधार, विशेष रूप से स्वदेशी ज्ञान (Indigenous Social Work Education ISWE), अब भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया है।
शोध में यह भी उल्लेख है कि भारत में सामाजिक कार्य शिक्षा पर लंबे समय से बहस और आलोचनाएं होती रही हैं खासतौर पर पाठ्यक्रम, व्यवहारिक प्रशिक्षण और स्थानीय सामाजिक वास्तविकताओं से जुड़ाव को लेकर।
शोध में विकासशील देशों के संदर्भ में सामाजिक कार्य शिक्षा के बदलते स्वरूप को पांच प्रमुख बिंदुओं में समझाया गया है।
1. विकसित देशों के मॉडल विकासशील देशों की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं।
2. सामाजिक कार्य शिक्षा का मॉडल देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों के अनुसार होना चाहिए।
3. इसे बहुसंख्यक आबादी की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं, विशेषकर गरीबी की चुनौती, को संबोधित करना चाहिए।
4. सामाजिक परिवर्तन और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकास के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
5. शिक्षा की संरचना, सामग्री और प्रक्रिया उद्देश्यों से सीधे जुड़ी होनी चाहिए और निरंतर समीक्षा आवश्यक है।
शोध के अनुसार सामाजिक कार्य एक ऐसा पेशा है जो स्थानीय, स्वदेशी और संदर्भ आधारित ज्ञान पर आधारित होता है। यह ज्ञान विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होता है जैसे सामाजिक कार्य पेशेवरों द्वारा विकसित स्वदेशी ज्ञान, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और दर्शन जैसे विषयों से प्राप्त सैद्धांतिक ज्ञान, क्षेत्रीय अनुभवों और अभ्यास के मूल्यांकन से अर्जित व्यवहारिक ज्ञान।
शोध का निष्कर्ष है कि सामाजिक कार्य शिक्षा छात्रों में सामाजिक संवेदनशीलता, नैतिक जिम्मेदारी, मानवीय दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय और समानता की समझ, व्यवहार और मूल्यों में संतुलन जैसे गुणों का विकास करती है। यह शिक्षा छात्रों को केवल नौकरी के योग्य नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाती है।

शोध स्पष्ट करता है कि सामाजिक कार्य शिक्षा के बिना मूल्य आधारित शिक्षा अधूरी है। यदि शिक्षा को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाना है तो सामाजिक कार्य को उच्च शिक्षा की मुख्यधारा में मजबूती से स्थापित करना होगा। स्वदेशी ज्ञान आधारित सामाजिक कार्य शिक्षा ही भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए सबसे प्रभावी मॉडल हो सकती है।
यह शोध न केवल शिक्षा जगत, बल्कि नीति निर्धारकों और सामाजिक संस्थाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सामने आया है।










