
आज के समय में बच्चों की परवरिश पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में अच्छा हो, आत्मविश्वासी बने और जीवन में सफल हो। इसके लिए वे अच्छे स्कूल, महंगे खिलौने, मोबाइल और हर सुविधा देने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है क्या बच्चे को सुविधाओं से ज्यादा हमारी मौजूदगी की जरूरत है?
आज कई छोटे बच्चे बहुत कम उम्र में मोबाइल और स्क्रीन के आदी हो रहे हैं। व्यस्त माता-पिता के लिए मोबाइल बच्चे को कुछ देर शांत रखने का आसान साधन बन गया है। समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका सहारे के रूप में लगातार इस्तेमाल है। बच्चा यदि हर बेचैनी, बोरियत या रोने पर स्क्रीन मांगने लगे तो धीरे-धीरे वह खुद को व्यस्त रखने और भावनाओं को संभालने की क्षमता खो सकता है।
बच्चों को हर समय व्यस्त रखना भी जरूरी नहीं। बोरियत भी बचपन का हिस्सा है। खाली समय में बच्चा कल्पना करता है, खेल बनाता है, सवाल पूछता है और अपने आसपास की दुनिया को समझता है।
परवरिश का सबसे प्रभावी तरीका उपदेश नहीं, उदाहरण है। जिस घर में माता-पिता स्वयं हर समय मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, वहां बच्चे से स्क्रीन छोड़ने की उम्मीद करना कितना तार्किक है? बच्चा वही ज्यादा सीखता है जो वह अपने माता-पिता को करते हुए देखता है।
बच्चे की हर गलती पर डांटना भी समाधान नहीं। गलती को सीखने का अवसर बनाया जा सकता है। उससे पूछा जाए तुम्हें क्या लगता है, ऐसा क्यों हुआ और अगली बार क्या कर सकते हो? इससे बच्चे में डर के बजाय सोचने की क्षमता विकसित होती है।
सबसे जरूरी है बच्चे को यह एहसास दिलाना कि उसका मूल्य केवल अच्छे अंक, प्रतियोगिता या उपलब्धियों से तय नहीं होता।
बच्चे को महंगे सामान से ज्यादा समय, संवाद, स्पर्श, खेल और भरोसे की जरूरत है। क्योंकि बचपन दोबारा नहीं आता। बच्चे के लिए सबसे खूबसूरत उपहार वह माता-पिता हैं, जो उसके पास सिर्फ मौजूद नहीं, बल्कि सचमुच उसके साथ मौजूद हों।









