
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। नशा मुक्ति के नाम पर नियमों का खुला खेल और मरीजों के साथ गंभीर अनियमितताएं हीरानगर स्थित निर्वाण उन्मूलन एवं पुनर्वास केंद्र का असली चेहरा बुधवार को उस समय सामने आ गया, जब आयुक्त/सचिव मुख्यमंत्री दीपक रावत ने केंद्र का औचक निरीक्षण किया।
निरीक्षण में गाइडलाइन उल्लंघन, अवैध भर्ती, अवैध वसूली और गंभीर प्रशासनिक लापरवाही सामने आने पर आयुक्त ने मौके पर ही केंद्र का लाइसेंस निरस्त करने के निर्देश एसीएमओ को दे दिए।
निरीक्षण में सामने आया कि नशा मुक्ति केंद्र में केवल नशे के आदी मरीजों को रखने की अनुमति है, लेकिन इसके बावजूद गैर-नशेड़ी और अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों को भी केंद्र में रखा गया, जो नियमों का गंभीर उल्लंघन और आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है। बिना अनुमति के महिला मरीजों को रखने का मामला भी सामने आया, जबकि केंद्र को केवल पुरुषों के लिए स्वीकृति प्राप्त है।
इसके अलावा यह भी उजागर हुआ कि भारत सरकार से संचालन के लिए बजट/धनराशि मिलने के बावजूद कुछ मरीजों से अवैध रूप से धनराशि वसूली की जा रही थी, जबकि इस संबंध में कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। आयुक्त ने इस मामले में केंद्र प्रबंधक डॉ. रश्मि पंत को गुरुवार सुबह 11 बजे तक सभी संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। बताते चलें कि डॉ. रश्मि पंत के पति डॉ. युवराज पंत सुशीला तिवारी राजकीय अस्पताल में मनोचिकित्सक हैं।
निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि शासन स्तर से केंद्र को केवल 30 मरीजों के निशुल्क उपचार की स्वीकृति है, लेकिन पंजिका में 30 से अधिक मरीजों का उपचार किया जाना पाया गया, जिनमें से कई का नाम रजिस्टर में दर्ज तक नहीं था। केंद्र सरकार द्वारा एनजीओ के माध्यम से 30 मरीजों के निशुल्क उपचार हेतु मासिक धनराशि दी जाती है, इसके बावजूद मरीजों से पैसे लेने की शिकायतें सामने आईं, जिनका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
चिकित्सा व्यवस्था में भी गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। नियमों के अनुसार नशा मुक्ति केंद्र में मानसिक चिकित्सक, फिजिशियन और मेडिकल ऑफिसर की अनिवार्य तैनाती होनी चाहिए, लेकिन निर्वाण केंद्र में केवल मानसिक चिकित्सक की तैनाती पाई गई, वह भी नियमित रूप से उपस्थित नहीं रहते थे। मरीजों को दवाइयां केंद्र के कर्मचारियों द्वारा लिखी जा रही थीं, जो नियमों के खिलाफ है।
आयुक्त के संज्ञान में यह भी आया कि पूर्व में एक महिला को केंद्र में उपचार हेतु रखा गया था, जो नशे की आदी भी नहीं थी और उसका कोई विधिवत रिकॉर्ड रजिस्टर में दर्ज नहीं था। इस पर आयुक्त ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
इसके अलावा कई मरीजों के आधार कार्ड, पैन कार्ड व अन्य व्यक्तिगत दस्तावेज मूल रूप में केंद्र में रखे जाने पर भी आयुक्त ने गंभीर आपत्ति दर्ज की और इसे कानूनन अपराध बताया, विशेषकर तब जब मरीज केंद्र छोड़ चुका हो।
मरीजों से अवैध धन वसूली के मामले में आयुक्त ने संचालक को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि जब सरकार द्वारा मरीजों का निशुल्क उपचार कराया जा रहा है और उसके एवज में सरकारी धनराशि भी दी जा रही है, तो मरीजों से पैसा लेना घोर अपराध है। इसी आधार पर उन्होंने मौके पर ही निर्वाण नशा मुक्ति केंद्र का लाइसेंस निरस्त करने के निर्देश जारी किए।
निरीक्षण के दौरान सिटी मजिस्ट्रेट गोपाल सिंह चौहान, अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. श्वेता भंडारी सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।









