
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। जहाँ एक ओर आधुनिक विकास के नाम पर अंधाधुंध वनों की कटाई से पर्यावरण असंतुलन गहरा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ समर्पित शख्सियतें अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से इस वीरान होती धरती को हरा-भरा करने में जुटी हैं।
ऐसे ही प्रेरणास्त्रोत पर्यावरणविद् और पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी डॉ. आशुतोष पंत आज पर्यावरण संरक्षण की दुनिया में एक सच्चे ‘हीरो’ के रूप में उभरे हैं। प्रतिकूल मौसम की चुनौतियों को दरकिनार करते हुए, उन्होंने इस वर्ष 35,000 पौधे लगाने के अपने महालक्ष्य को पूरा करने के लिए अपनी मुहिम को अक्टूबर माह में भी पूरी शिद्दत के साथ जारी रखा है।
प्रतिकूल मौसम को दी मात, लालकुआं में बांटे फलदार पौधे
विगत दिनों डॉ. पंत ने लालकुआं क्षेत्र के कार रोड, संजयनगर और बिंदुखत्ता के ग्रामीणों को घर-घर जाकर फलों के पौधे भेंट किए। इस नेक कार्य में उत्तराखंड शासन के पूर्व अपर सचिव जे.सी. उप्रेती और दिव्यांग समिति के अध्यक्ष संतोष कश्यप का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिला।
आम तौर पर लोग यही मानते हैं कि पौधरोपण के लिए केवल जुलाई से सितंबर (वर्षा ऋतु) का समय ही उपयुक्त होता है, लेकिन इस वर्ष अक्टूबर माह में हुई अच्छी बारिश और अनुकूल मौसम को भुनाते हुए डॉ. पंत ने अपने अभियान को थमने नहीं दिया। उनकी नर्सरी में बचे हुए शेष पौधों को भी जल्द से जल्द रोपित करने का उनका जज्बा वाकई काबिले-तारीफ है।
पौधों की नब्ज पहचानते हैं डॉ. पंत
पर्यावरण और वनस्पति विज्ञान का उनका गहरा अनुभव बताता है कि मैदानी क्षेत्रों में मई-जून की भीषण गर्मी और 15 दिसंबर से 15 फरवरी के कड़ाके के पाले (Frost) के दौरान बड़े पैमाने पर पौधरोपण से बचना चाहिए, क्योंकि इन परिस्थितियों में नए पौधों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। हालांकि, वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि पूरी देखभाल करने पर विपरीत मौसम में भी पौधों को बचाया जा सकता है।
शीतकाल के लिए खास योजना
डॉ. पंत का मानना है कि सर्दी का मौसम पूरी तरह पौधरोपण के लिए अयोग्य नहीं है। इस दौरान भी विशेष किस्में लगाई जा सकती हैं:
मैदानी क्षेत्रों में: पॉपलर आदि के पौधे।
पर्वतीय क्षेत्रों में: अखरोट, सेब, नाशपाती और आड़ू के पौधे।
चूंकि शीतकाल में ये पौधे सुषुप्तावस्था (Dormancy) में होते हैं और इनमें पत्तियाँ नहीं होतीं, इसलिए मार्च आते ही इनमें नई कोंपलें फूट पड़ती हैं। इसी कड़ी में, उनकी आगामी जनवरी-फरवरी माह में पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अखरोट के पौधे लगाने की शानदार योजना है।
सिर्फ पौधे नहीं, युवा पीढ़ी में अलख जगा रहे हैं ‘हीरो’
डॉ. आशुतोष पंत का यह अभियान केवल धरती पर हरियाली लाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह स्कूलों और कॉलेजों में जाकर विद्यार्थियों को जल संरक्षण, पॉलीथीन के दुष्प्रभावों और वृक्षारोपण के प्रति जागरूक करने का महान कार्य भी कर रहे हैं।
डॉ. आशुतोष पंत कहते हैं कि विकास के नाम पर काटे जा रहे जंगल निराशाजनक जरूर हैं, लेकिन हमें हिम्मत नहीं हारनी है। पर्यावरण प्रेमियों और शुभचिंतकों के साथ से एक दिन स्थितियां जरूर बदलेंगी।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका यह अटूट समर्पण और संघर्ष आज के दौर में हम सभी के लिए एक मिसाल है। उम्मीद है कि डॉ. पंत का यह कारवां यूं ही आगे बढ़ता रहेगा और हमारी धरती एक बार फिर हरी-भरी हो उठेगी।











