
देहरादून, प्रेस 15 न्यूज। साहित्य समाज का आईना माना जाता है, जहां शब्दों की ईमानदारी सबसे बड़ा मूल्य होती है। लेकिन उत्तराखंड में सामने आए एक मामले ने न केवल साहित्यिक जगत को झकझोर दिया है, बल्कि पुरस्कार व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला उत्तराखंड भाषा संस्थान द्वारा दिए गए प्रतिष्ठित कन्हैयालाल डंडरियाल पुरस्कार से जुड़ा है, जिसे अनियमितता सामने आने के बाद निरस्त कर दिया गया है।
गढ़वाली काव्य संग्रह ‘कुरमुरी’ के लिए वर्ष 2025 का यह सम्मान साहित्यकार ओम बधाणी को दिया गया था। आरोप है कि पुरस्कार हासिल करने के लिए पुस्तक के पुराने संस्करण को नए प्रकाशन वर्ष के साथ दोबारा प्रस्तुत किया गया।
शिकायत में कहा गया कि यह काव्य संग्रह मूल रूप से वर्ष 2013 में प्रकाशित हुआ था, जबकि पुरस्कार के नियमों के अनुसार केवल वर्ष 2022 से 2024 के बीच प्रकाशित मौलिक पुस्तकों को ही पात्र माना जाना था।
बताया गया कि पुस्तक का कवर और प्रकाशन वर्ष बदलकर उसे 2023 का संस्करण दिखाया गया और उसी आधार पर पुरस्कार के लिए आवेदन किया गया। शिकायतकर्ता संदीप गढ़वाली ने उत्तराखंड भाषा संस्थान को दस्तावेजी प्रमाण सौंपते हुए पूरे मामले की जांच की मांग की थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए भाषा संस्थान ने संबंधित साहित्यकार को नोटिस जारी किया। जवाब में इसे “भूलवश हुई त्रुटि” बताया गया, लेकिन जांच में आरोप सही पाए गए। इसके बाद संस्थान ने पुरस्कार निरस्त कर दिया। ओम बधाणी द्वारा पुरस्कार राशि और सम्मान पत्र लौटाए जाने की पुष्टि भी की गई है।
उत्तराखंड भाषा संस्थान की निदेशक माया ढकरियाल ने माना कि इस तरह का मामला पहली बार सामने आया है और आगे की कार्रवाई को लेकर भाषा मंत्री से मार्गदर्शन मांगा गया है।
लेकिन इस पूरे प्रकरण ने केवल एक पुरस्कार पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं जहां कथित जोड़तोड़ और ‘जुगाड़’ के जरिए सम्मान हासिल करने की चर्चाएं लंबे समय से होती रही हैं। साहित्यिक हलकों में अब यह मांग भी उठने लगी है कि पिछले वर्षों में दिए गए पुरस्कारों की भी निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक और योग्य रचनाकारों के साथ न्याय हो सके।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब पुरस्कार के स्पष्ट मानक तय थे, तब आवेदन की जांच और सत्यापन प्रक्रिया में इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? क्या जिम्मेदार संस्थागत स्तर पर सतर्कता नहीं बरती गई या फिर सिस्टम में कहीं न कहीं लापरवाही मौजूद थी?
यह घटना केवल एक सम्मान निरस्त होने भर का मामला नहीं है, बल्कि उस भरोसे पर चोट है जो साहित्य और सम्मान की निष्पक्ष परंपरा से जुड़ा होता है। अगर योग्य रचनाकारों को दरकिनार कर प्रभाव और प्रबंधन के सहारे पुरस्कार बांटे जाएंगे, तो इससे साहित्यिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी गहरा असर पड़ेगा।









