
एमबीपीजी हल्द्वानी से डीएसबी नैनीताल, रामनगर, कोटाबाग, हल्दूचौड़ महाविद्यालयों के नतीजों ने खड़े किए सवाल, 2027 से पहले नैनीताल जिले की भाजपा लीडरशिप के लिए युवाओं का संदेश पढ़ना जरूरी

हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। छात्रसंघ चुनाव महज कॉलेजों की सत्ता का चुनाव नहीं होते। खासकर उत्तराखंड जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश में कैंपस का माहौल कई बार समाज और राज नीति के बदलते मिजाज की आहट भी देता है।
ऐसे में नैनीताल जिले के छात्रसंघ चुनाव परिणामों ने भाजपा के लिए एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। क्या जिले के युवाओं से भाजपा की राजनीतिक डोर कहीं कमजोर तो नहीं पड़ रही?
प्रदेश के कई महाविद्यालयों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का प्रदर्शन मजबूत रहा, लेकिन नैनीताल जिले के प्रमुख परिसरों में तस्वीर अलग दिखाई दी।
हल्द्वानी के एमबीपीजी महाविद्यालय में तो पार्टी संगठन के लिए परिणाम खास तौर पर आत्ममंथन का विषय बन गया। एबीवीपी से टिकट न मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे आर्यन बेलवाल ने अध्यक्ष पद जीत लिया, जबकि एबीवीपी के अधिकृत प्रत्याशी धीरज बिष्ट 988 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। आर्यन को 1723 और एनएसयूआई के मेहुल शाह को 1257 मत मिले।
जब सड़क पर उतरी पूरी ताकत, तब नतीजे ने क्या संदेश दिया?
सबसे दिलचस्प सवाल एमबीपीजी के चुनावी दिन का है। कॉलेज के सामने नैनीताल रोड पर भाजपा जिलाध्यक्ष प्रताप सिंह बिष्ट, जिला महामंत्री रंजन बर्गली, विनीत अग्रवाल, दर्जा राज्यमंत्री शंकर कोरंगा और मेयर गजराज सिंह बिष्ट समेत भाजपा से जुड़े छोटे बड़े चेहरे एबीवीपी प्रत्याशी के समर्थन में सक्रिय नजर आए।

इससे तीन दिन पहले भारतीय जनता पार्टी संभाग कार्यालय में बैठक आयोजित की गई। जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रांत संगठन मंत्री अंकित सुन्द्रियाल, विभाग संगठन मंत्री कैलाश बिष्ट, प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र बिष्ट, प्रदेश प्रवक्ता विकास भगत, दर्जा राज्य मंत्री शंकर सिंह कोरंगा, मोहन पाठक, जिला महामंत्री रंजन बर्गली, विनीत अग्रवाल, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य एवं पूर्व मेयर जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला, पार्षदगण सहित भारतीय जनता पार्टी के ज्येष्ठ-श्रेष्ठ कार्यकताओं के साथ साथ प्रत्याशी धीरज बिष्ट की मौजूदगी रही।
पूरे चुनाव में संगठन की ओर से राजनीतिक ताकत और प्रभाव का प्रदर्शन दिखाई दिया। लेकिन मतपेटियों से निकला परिणाम बिल्कुल अलग तस्वीर लेकर आया।
क्या यह सिर्फ एक छात्रसंघ चुनाव था? या फिर युवाओं के बीच संगठन की स्वीकार्यता को लेकर कोई बड़ा संकेत? यही सवाल अब भाजपा के जिले से लेकर प्रदेश स्तर तक के रणनीतिकारों के सामने खड़ा है।
एमबीपीजी में बगावत ने खोली संगठन के भीतर की परत
एमबीपीजी चुनाव की कहानी सिर्फ हार की नहीं है। यह संगठन के भीतर टिकट को लेकर पैदा हुए विवाद की कहानी भी है। चुनाव से पहले एबीवीपी ने धीरज बिष्ट को अध्यक्ष पद का अधिकृत प्रत्याशी बनाया। इसके बाद संगठन से जुड़े रहे आर्यन बेलवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनके समर्थन में एबीवीपी से जुड़े लोगों की ओर से इस्तीफे की पेशकश की खबरें भी सामने आईं।
नतीजा सामने है आर्यन बेलवाल अध्यक्ष बने और एबीवीपी प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे। यहीं से भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल निकलता है क्या संगठन ने अपने ही जमीनी कार्यकर्ताओं और छात्रों के बीच बन रहे असंतोष को समय रहते पढ़ा?
डीएसबी ने भी दिया अलग संकेत
नैनीताल के डीएसबी परिसर का परिणाम भी भाजपा के लिए ध्यान खींचने वाला रहा। यहां निर्दलीय भानु प्रताप सिंह चौहान ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। एबीवीपी के शुभम कुमार को 873 मत मिले, जबकि भानु प्रताप सिंह चौहान को 1355 मत मिले।
दिलचस्प यह भी है कि चुनाव से पहले एबीवीपी ने शुभम कुमार को अपना अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया था और संगठन ने छात्र हितों के नाम पर उनके समर्थन की अपील की थी।
अर्थात नैनीताल जिले के दो प्रमुख और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परिसरों एमबीपीजी हल्द्वानी और डीएसबी नैनीताल में अध्यक्ष पद एबीवीपी के हाथ नहीं आया। इसके अलावा कोटाबाग, रामनगर, हल्दूचौड़ महाविद्यालयों में भी हार देखनी पड़ी।
प्रदेश में तस्वीर अलग, फिर नैनीताल में क्यों?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरे उत्तराखंड में एबीवीपी ने कई प्रमुख परिसरों में जीत दर्ज की है। डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून में नवदीप राणा अध्यक्ष निर्वाचित हुए। मसूरी के एमपीजी कॉलेज में भी एबीवीपी ने अध्यक्ष समेत प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। लोहाघाट में भी एबीवीपी का प्रदर्शन मजबूत रहा।
ऐसे में नैनीताल जिले की तस्वीर को महज प्रदेशव्यापी छात्रसंघ चुनाव के सामान्य परिणामों में समेट देना आसान नहीं है। यहां सवाल स्थानीय संगठन, स्थानीय नेतृत्व और युवाओं से उसके संवाद का भी है। क्या सरकार के काम का संदेश युवाओं तक पहुंच रहा है?
नैनीताल जिले में भाजपा के सामने छह विधानसभा क्षेत्र हैं नैनीताल, हल्द्वानी, लालकुआं, कालाढूंगी, भीमताल और रामनगर। 2027 का विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं है। ऐसे समय में छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को केवल कॉलेज की राज नीति मानकर छोड़ देना शायद राजनीतिक रूप से पर्याप्त नहीं होगा।
सवाल यह भी है कि सरकार के जनहित के फैसले, योजनाएं और विकास कार्य युवाओं तक किस रूप में पहुंच रहे हैं? क्या पार्टी का स्थानीय संगठन इन फैसलों को जमीन पर युवाओं से जोड़ पा रहा है? या फिर संगठन की ऊर्जा आपसी समीकरणों, पद और टिकट की खींचतान में अधिक खर्च हो रही है?
क्योंकि सरकार काम कर सकती है, लेकिन उस काम का संदेश जनता तक पहुंचाने का काम संगठन से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी है।
‘दो लोगों की सोच’ पर चर्चा, लेकिन जवाब भी जरूरी
एमबीपीजी की हार के बाद शहर में एक चर्चा यह भी है कि एबीवीपी को कमजोर करने में कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र के दो प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही। दावा है कि जातीय समीकरण, विशेषकर ठाकुरवाद की सोच को लेकर इन लोगों ने आर्यन बेलवाल के बजाय धीरज बिष्ट को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाया और इसके चलते आर्यन बागी हो गए।
अगर संगठन के भीतर ऐसी धारणा बन रही है कि छात्र राज नीति में योग्यता और जमीनी स्वीकार्यता से ज्यादा जातीय समीकरण प्रभावी हैं, तो यह धारणा स्वयं भाजपा नेतृत्व के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। क्योंकि राज नीति में कई बार वास्तविक नुकसान किसी आरोप से नहीं, बल्कि संगठन के भीतर पैदा हुई धारणा से होता है।
आईटीआई गैंग से जोड़कर भी उठते हैं सवाल
हल्द्वानी में असामाजिक गतिविधियों और तथाकथित ‘आईटीआई गैंग’ को लेकर भी राजनीतिक हलकों में कालाढूंगी विधानसभा के कुछ लोगों की भूमिका पर चर्चा होती रही है।
ऐसे में अगर सत्ता से जुड़े किसी राजनीतिक नेटवर्क पर युवाओं को गुटबाजी, हिंसा, नशे या अराजक गतिविधियों की ओर धकेलने जैसे आरोप लगते हैं, तो क्या पार्टी नेतृत्व को उनकी निष्पक्ष जांच और राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं करनी चाहिए?
यही वह बिंदु है जहां संगठन की छवि, युवाओं की राज नीति और 2027 का चुनावी वातावरण एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
इस्तीफों के बाद भी दखल क्यों नहीं?
एमबीपीजी में टिकट को लेकर विवाद कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं थी। चुनाव से पहले ही एबीवीपी के भीतर बगावत की खबरें सार्वजनिक हो गई थीं।
फिर सवाल उठता है क्या भाजपा और एबीवीपी के वरिष्ठ नेतृत्व ने समय रहते इस विवाद को सुलझाने की गंभीर कोशिश की? अगर कोशिश हुई तो उसका असर नतीजों में क्यों नहीं दिखा? और अगर कोशिश नहीं हुई, तो क्या यही चूक चुनाव परिणाम में बदल गई?
यह सवाल सिर्फ एबीवीपी का नहीं है। यह उस राजनीतिक संगठनात्मक संस्कृति का सवाल है, जिसमें स्थानीय कार्यकर्ताओं और युवाओं की नाराजगी को समय रहते पढ़ना जरूरी होता है।
2027 से पहले आत्ममंथन का समय
छात्रसंघ चुनाव विधानसभा चुनाव नहीं होते। किसी कॉलेज के चुनाव परिणाम को सीधे विधानसभा चुनाव की जनभावना मान लेना भी सही नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में सक्रिय युवा वर्ग आने वाले वर्षों की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करता है।
इसलिए नैनीताल जिले के इन परिणामों को चुनावी भविष्यवाणी के बजाय एक राजनीतिक संकेत की तरह देखना अधिक उचित होगा।
भाजपा के जिला नेतृत्व, विधायकों और संगठन के ऊपर से नीचे तक जिम्मेदार पदाधिकारियों के सामने अब कई सवाल हैं। क्या युवाओं के बीच संगठन की पकड़ पहले जैसी है? क्या स्थानीय नेतृत्व युवाओं की बात सुन रहा है? क्या कार्यकर्ताओं की नाराजगी ऊपर तक पहुंच रही है? क्या टिकट और संगठनात्मक फैसलों में जमीनी स्वीकार्यता को पर्याप्त महत्व मिल रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल क्या भाजपा की डोर ‘जन’ से उतनी ही मजबूती से जुड़ी हुई है, जितनी पार्टी नेतृत्व मान रहा है? एमबीपीजी की मतपेटी ने कम से कम इतना जरूर कर दिया है कि इन सवालों को अब टाला नहीं जा सकता।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले नैनीताल जिले में भाजपा के लिए यह परिणाम जीत-हार से ज्यादा एक आईना है। सवाल यह है कि पार्टी उस आईने में दिखाई दे रही तस्वीर को कितनी गंभीरता से पढ़ती है।









