
रानीखेत, प्रेस 15 न्यूज। पर्यावरण संरक्षण को केवल भाषणों तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर हरियाली का भविष्य तैयार करने की मुहिम चला रहे पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी एवं पर्यावरणविद् डॉ. आशुतोष पंत अब लोगों से अपने आसपास ‘ऑक्सीजन बैंक’ बनाने की अपील कर रहे हैं। खास बात यह है कि इसके लिए पौधे और तकनीकी सहायता भी वे निशुल्क उपलब्ध कराने को तैयार हैं।
12 अगस्त को राजकीय डिग्री कॉलेज रानीखेत परिसर में डॉ. पंत के सहयोग से वृहद पौधारोपण किया गया। इससे पहले जुलाई में भी यहां बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए थे। कॉलेज परिसर की खाली भूमि पर करीब 100 पेड़ों का सघन वन विकसित किया जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में विद्यार्थियों और समाज के लिए पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण बनेगा।
डॉ. पंत ने कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. पुष्पेश पांडे का आभार जताते हुए कहा कि उन्हें महाविद्यालय के लिए पौधे उपलब्ध कराने और पौधारोपण में सहभागिता का अवसर मिला। पौधारोपण में एनसीसी कैडेट्स ने भी उत्साहपूर्वक सहयोग किया।
उन्होंने कॉलेज के शिक्षक डॉ. पीएन तिवारी, डॉ. प्राची जोशी, एनसीसी प्रभारी डॉ. लक्ष्मी, डॉ. शंकर सहित डॉ. जगदीश सती और ललित धारियाल का सहयोग के लिए आभार जताया।
छोटी जमीन पर भी तैयार हो सकता है घना जंगल
डॉ. पंत के अनुसार सघन वन विकसित करने की मियावाकी पद्धति में पौधों को सामान्य से अधिक नजदीक लगाया जाता है। इससे पौधे प्रकाश के लिए तेजी से ऊपर की ओर बढ़ते हैं और कम समय में घना वन तैयार किया जा सकता है।
उनका कहना है कि जहां सामान्य जंगल को विकसित होने में लंबा समय लग सकता है, वहीं उचित देखभाल के साथ मियावाकी पद्धति से कुछ वर्षों में घना हरित क्षेत्र तैयार किया जा सकता है।
ऐसे सघन वन केवल हरियाली नहीं बढ़ाते, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूत करते हैं। घने पेड़ों वाले क्षेत्र में तापमान कम रखने, पक्षियों और परागण करने वाले जीवों को आकर्षित करने तथा जैव विविधता को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
15 सघन वन बना चुके हैं डॉ. पंत
डॉ. पंत बताते हैं कि वह अब तक 15 सघन वन तैयार कर चुके हैं। इनमें दो ऐसे भी हैं, जो आधे बीघे से भी कम क्षेत्र में विकसित किए गए हैं। उनका संदेश साफ है जंगल बनाने के लिए बड़ी जमीन जरूरी नहीं, जरूरत है इच्छाशक्ति और लगातार देखभाल की।
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने स्कूलों और संस्थाओं से आगे आने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि कोई विद्यालय या संस्था अपने परिसर में सघन वन विकसित करना चाहती है तो वह उनसे संपर्क कर सकती है। पौधे और तकनीकी सहायता निशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी।
इसके लिए परिसर का चारदीवारी से सुरक्षित होना जरूरी होगा, ताकि पौधों को जानवरों से नुकसान न पहुंचे। साथ ही शुरुआती करीब दो वर्षों तक सिंचाई की व्यवस्था संस्था को करनी होगी। इसके बाद तीन से पांच वर्षों में परिसर में एक घना वन तैयार हो सकता है, जो पर्यावरण और पारिस्थितिकी का मॉडल बनेगा।
बिस्वा गांव में भी बांटे फलदार पौधे
12 अगस्त को ही डॉ. पंत ने रानीखेत के बिस्वा गांव के ग्रामीणों को फलदार पौधों का वितरण भी किया। उनका प्रयास केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को अपने आसपास हरित क्षेत्र विकसित करने के लिए प्रेरित करना भी है।
डॉ. पंत की यह पहल एक सीधा संदेश देती है अगर हर स्कूल, संस्था और गांव अपनी थोड़ी-सी जमीन पर भी सघन वन तैयार करे, तो हजारों छोटे-छोटे ‘ऑक्सीजन बैंक’ मिलकर उत्तराखंड के पर्यावरण को नई ताकत दे सकते हैं।









