
लोहाघाट, प्रेस 15 न्यूज। हर सुबह जीआईसी मैदान में जब युवाओं के कदम दौड़ते हैं तो वहां सिर्फ पैरों की रफ्तार नहीं होती, बल्कि सैकड़ों सपनों की धड़कन सुनाई देती है। कोई सेना की वर्दी का सपना लेकर दौड़ रहा है तो कोई पुलिस और अर्धसैनिक बल में जाने की तैयारी कर रहा है।
इन सपनों को दिशा देने के लिए पिछले छह वर्षों से एक पूर्व एनएसजी कमांडो रोज मैदान में पसीना बहा रहे हैं। मनोज सिंह कणकरायत ने ठाना है कि युवाओं के हाथ में नशे का सामान नहीं, बल्कि मेहनत की ताकत और वर्दी का गौरव होना चाहिए।
सुखद पहलू यह है कि बिना किसी शुल्क के दिए जा रहे उनके प्रशिक्षण से अब तक सैकड़ों युवा लाभान्वित भी हो चुके हैं। और आज सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों का हिस्सा हैं।
सेना की सेवा के बाद युवाओं को सही राह दिखाने का संकल्प
19 कुमाऊं से सेवानिवृत्त एनएसजी कमांडो मनोज सिंह कणकरायत 42 वर्ष के हैं। मूल रूप से कणकरायत गांव के रहने वाले मनोज वर्तमान में प्रेमनगर में रहते हैं। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद वह नियमित रूप से अभ्यास के लिए जीआईसी मैदान पहुंचते थे। मैदान में उनके अनुशासन, फिटनेस और अभ्यास को देखकर धीरे-धीरे युवक-युवतियां उनसे प्रशिक्षण लेने लगे। कुछ युवाओं से शुरू हुआ यह सिलसिला देखते ही देखते सैकड़ों युवाओं तक पहुंच गया।
हर सुबह मैदान में पसीना, लक्ष्य वर्दी
हर सुबह जीआईसी मैदान में मनोज युवाओं के साथ खुद भी अभ्यास करते हैं। दौड़, शारीरिक दक्षता, फिटनेस और अनुशासन के साथ वह युवाओं को विभिन्न भर्ती परीक्षाओं की शारीरिक तैयारियों के लिए प्रशिक्षित करते हैं। खास बात यह है कि इस प्रशिक्षण के लिए वह युवाओं से कोई शुल्क नहीं लेते।
मनोज का मानना है कि युवाओं के भीतर ऊर्जा और प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, जरूरत सिर्फ उसे सही दिशा देने की है। इसी सोच के साथ वह लगातार युवाओं को मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति समर्पण का महत्व समझाते हैं।
कई युवाओं ने पहनी सपनों की वर्दी
छह वर्षों से चल रहे इस नि:शुल्क प्रशिक्षण का असर अब साफ दिखाई देता है। मनोज से प्रशिक्षण लेने वाले कई युवा सेना, अर्धसैनिक बलों, पुलिस और होमगार्ड में चयनित होकर अपने सपने पूरे कर चुके हैं। उनके लिए यह केवल युवाओं को भर्ती की तैयारी कराने का काम नहीं, बल्कि उनके जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अभियान है।
वर्दी में लौटकर मिलने वाला जवान बन जाता है सबसे बड़ा पुरस्कार
मनोज के लिए इस काम का सबसे बड़ा पुरस्कार कोई आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि वह पल है जब प्रशिक्षण लेने वाला कोई युवा वर्दी पहनकर वापस उनके पास आता है। जिस युवक को उन्होंने कभी मैदान में दौड़ते, पसीना बहाते और अपने लक्ष्य के लिए संघर्ष करते देखा था, जब वही युवा वर्दी में सामने खड़ा होता है तो मनोज के चेहरे पर उसकी मेहनत की खुशी साफ दिखाई देती है।
वह कहते हैं कि सेना में रहते हुए देश की सेवा करने का अवसर मिला। अब सेवानिवृत्ति के बाद युवाओं को सही दिशा देकर समाज और देश के लिए अपना योगदान देना ही उनका लक्ष्य है।
नशे के खिलाफ मैदान में तैयार हो रही नई सोच
नशे के बढ़ते प्रभाव के बीच मनोज का यह प्रयास युवाओं के लिए एक सकारात्मक विकल्प भी तैयार कर रहा है। जिस समय कई युवा अपनी ऊर्जा गलत दिशा में खर्च कर रहे हैं, उसी समय लोहाघाट का यह मैदान युवाओं को मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य से जोड़ रहा है।
सुबह मैदान में दौड़ते युवाओं के कदम सिर्फ भर्ती की तैयारी नहीं कर रहे, बल्कि यह संदेश भी दे रहे हैं कि युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा मिले तो वही ऊर्जा उनके भविष्य और समाज दोनों को बदल सकती है।
मनोज छह साल से इसी विश्वास के साथ मैदान में जुटे हैं नशे से दूर रहो, मेहनत से जुड़ो और अपने भीतर वर्दी पहनने का सपना जिंदा रखो।
(लोहाघाट से वरिष्ठ पत्रकार गणेश दत्त पांडेय की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ✍️)









