
हल्द्वानी, प्रेस 15 न्यूज। विकास के नाम पर जहां सड़कों और निर्माण परियोजनाओं की राह में हरे-भरे पेड़ों पर आरियां चलना आम हो गया है, वहीं पर्यावरण संरक्षण की मुहिम में डॉ. आशुतोष पंत एक अलग मिसाल पेश कर रहे हैं।
पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी और पर्यावरणविद् डॉ. पंत अब तक पांच लाख से अधिक पेड़ धरती पर रोपित कर चुके हैं। खास बात यह है कि हरियाली बढ़ाने का यह अभियान उन्होंने किसी सरकारी मदद के भरोसे नहीं, बल्कि अपने संसाधनों से आगे बढ़ाया है।
डॉ. पंत का मानना है कि आने वाले समय में जंगलों का घटता क्षेत्रफल मानव जीवन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। उनका कहना है कि पेड़ों की संख्या कम होने से तापमान बढ़ रहा है और बारिश के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। कहीं अतिवृष्टि तो कहीं सूखे जैसी स्थितियां चिंता बढ़ा रही हैं।
डॉ. पंत कहते हैं कि आइए सघन वन लगाएं, ये प्राणवायु के भंडार हैं। जहां पेड़ों की संख्या अधिक होती है, वहां वातावरण अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और पूरा पारिस्थितिक तंत्र विकसित होने की संभावना बढ़ती है। घने जंगलों में तितलियों, पक्षियों और दूसरे जीवों को भी अपना बसेरा मिलता है।
छोटी जगह में तैयार हो सकता है घना जंगल
डॉ. पंत शहरों में जगह की कमी को देखते हुए मियावाकी विधि से सघन वन विकसित करने पर जोर देते हैं। उनके मुताबिक इस तकनीक में कम जगह में पौधों को अपेक्षाकृत नजदीक लगाकर कम समय में घना वन तैयार किया जा सकता है। उनका कहना है कि उन्होंने स्वयं कई छोटे-छोटे सघन वन तैयार किए हैं, जिनमें रुद्रपुर के पुराने जिला चिकित्सालय परिसर में विकसित सघन वन भी शामिल है।
उनके मुताबिक एक बार जब किसी स्थान पर घना वन आकार लेने लगता है तो वहां पक्षियों, तितलियों और दूसरे जीवों की आवाजाही बढ़ने लगती है और धीरे-धीरे एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र विकसित होने लगता है।
किसान, स्कूल और संस्थाओं को निशुल्क मदद
डॉ. पंत ने किसानों, स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं से भी सघन वन लगाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि कोई अपने परिसर में सघन वन विकसित करना चाहता है तो वह उनसे संपर्क कर सकता है। पौधे और तकनीकी जानकारी वह निशुल्क उपलब्ध कराएंगे, जबकि सिंचाई की व्यवस्था संबंधित संस्था या व्यक्ति को करनी होगी।
पेड़ लगाने को महज पौधरोपण कार्यक्रम न मानकर उसे जीवन और पर्यावरण बचाने का अभियान मानने वाले डॉ. पंत का पांच लाख से अधिक पौधे रोपने का सफर बताता है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, लगन और लगातार प्रयास भी धरती की तस्वीर बदल सकते हैं।











