Nainital: रामगढ़ की बेटी भारती की पहल बनी मिसाल, पीरूल से संवारी 45 महिलाओं की जिंदगी

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रामगढ़ (नैनीताल) प्रेस 15 न्यूज। पहाड़ों में अक्सर जिस पीरूल को जंगलों की आग का कारण और अभिशाप माना जाता है, रामगढ़ ब्लॉक के घ्वेती गांव की भारती जीना ने उसी पीरूल को रोजगार और पर्यावरण संरक्षण का माध्यम बना दिया।

अपने हुनर और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर भारती ने करीब 40 से 45 महिलाओं को पीरूल से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने से जोड़ा और उन्हें आत्मनिर्भरता की राह दिखाई।

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भारती जीना को बचपन से ही हस्तशिल्प का शौक रहा। उन्होंने पीरूल की टोकरी बनाना अपने दादा जी से सीखा।

शुरुआत में यह उनके लिए महज एक हुनर और शौक था, लेकिन समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि इस कला के जरिए गांव की महिलाओं को रोजगार से जोड़ा जा सकता है। इसके बाद उन्होंने अकेले आगे बढ़ने के बजाय आसपास की महिलाओं को साथ लिया और उन्हें पीरूल से टोकरी व अन्य उपयोगी सामान बनाना सिखाया।

धीरे-धीरे यह प्रयास एक छोटे से हुनर से महिलाओं के सामूहिक आत्मनिर्भरता अभियान में बदल गया। आज करीब 40 से 45 महिलाएं इस काम से जुड़कर अपने हाथों से उत्पाद तैयार कर रही हैं और उन्हें बेचकर अपनी आय का जरिया बना रही हैं।

हुनर से आगे बढ़कर जंगल बचाने का संकल्प

भारती जीना की पहल केवल महिलाओं को रोजगार देने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने पहाड़ों में हर साल लगने वाली जंगलों की आग और उसमें पीरूल की भूमिका को करीब से देखा। गर्मियों में जंगलों में सूखा पीरूल आग को फैलाने में मदद करता है। वहीं, आग की चपेट में जंगल, वन्यजीव और किसानों के फलदार पेड़ भी प्रभावित होते हैं।

यही दृश्य भारती के मन में एक नई सोच लेकर आया—जिस पीरूल को लोग परेशानी समझते हैं, उसे जंगल से हटाकर उपयोगी उत्पादों में बदला जाए।

इसके बाद महिलाओं का समूह बनाकर जंगलों से पीरूल एकत्र करने की पहल शुरू की गई। पीरूल को सुरक्षित स्थानों पर एकत्र किया जाता है और फिर उसका उपयोग हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने में किया जाता है। इससे एक तरफ जंगलों में सूखे पीरूल का भार कम करने में मदद मिल रही है, तो दूसरी तरफ महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है।

भारती का संदेश साफ है पीरूल पहाड़ के लिए केवल समस्या नहीं, बल्कि सही सोच और हुनर के साथ रोजगार का अवसर भी बन सकता है।

“बेजुबानों का घर उजड़े नहीं, किसानों के बच्चों का कल जले नहीं”

भारती जीना कहती हैं कि जंगल की आग केवल पेड़ों को नहीं जलाती, बल्कि पहाड़ के लोगों की उम्मीदों को भी नुकसान पहुंचाती है। जंगलों में आग से वन्यजीवों का आशियाना उजड़ता है और किसानों के फलदार पेड़ भी इसकी चपेट में आते हैं। पहाड़ के अनेक परिवारों की आजीविका फल उत्पादन पर निर्भर है और ऐसे में पेड़ों को बचाना उनके बच्चों के भविष्य को बचाने जैसा है।

उनकी सोच है कि अगर महिलाएं मिलकर जंगलों से पीरूल उठाएं, तो इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ परिवारों की आमदनी भी बढ़ाई जा सकती है।

कर्तव्य फाउंडेशन से जुड़कर बढ़ी पहल की ताकत

हाल ही में भारती जीना कर्तव्य फाउंडेशन से भी जुड़ी हैं। संस्था के सहयोग से उनके प्रयासों को और मजबूती मिल रही है। भारती की इस पहल की जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने भी सराहना की। उन्होंने हस्तशिल्प से तैयार उत्पादों के जरिए पर्यावरण संरक्षण और महिला आत्मनिर्भरता के इस प्रयास को सराहनीय बताया।

भारती जीना की कहानी यह संदेश देती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। एक हुनर, एक सकारात्मक सोच और दूसरों को साथ लेकर चलने का जज्बा भी पूरे गांव की तस्वीर बदल सकता है।

आज भारती अकेली नहीं हैं। उनके साथ दर्जनों महिलाएं हैं, जिनके हाथों में हुनर है, आंखों में आत्मनिर्भर बनने का सपना है और कदम पहाड़ के जंगलों को बचाने की दिशा में बढ़ रहे हैं।

पेड़ बचेंगे, तभी फल उगेंगे… पीरूल उठेगा, तभी जंगल बचेगा।

भारती जीना की यह पहल सिर्फ टोकरी बनाने की कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के हुनर, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की एक प्रेरक मिसाल है।

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संजय पाठक

संपादक - प्रेस 15 न्यूज | अन्याय के विरुद्ध, सच के संग हूं... हां मैं एक पत्रकार हूं

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