
चंपावत, प्रेस 15 न्यूज। उत्तराखंड की राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हुए, जिन्होंने अपने पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और जनसेवा के संकल्प से लोगों के हृदय में अमिट स्थान बनाई। स्वर्गीय बच्ची सिंह रावत ‘बचदा’ ऐसे ही जननेता थे।
हिमालय की गोद में पले-बढ़े बचदा के व्यक्तित्व में पहाड़ की दृढ़ता, गंगा की निर्मलता और उत्तराखंड की लोकसंस्कृति एवं संस्कारों की सहज सुगंध समाहित थी। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श, राजनीतिक शुचिता, सरल व्यवहार और दूरदर्शी सोच आज भी जनमानस में जीवंत हैं।
10 अक्टूबर 1949 को रानीखेत क्षेत्र के एक गांव में जन्मे बच्ची सिंह रावत ने अपने परिश्रम, संकल्पशक्ति और जनसेवा के बल पर राजनीति में विशिष्ट पहचान बनाई। उनका जीवन इस बात का उदाहरण था कि व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहकर भी सफलता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के दो बार सदस्य और राजस्व उपमंत्री रहने के बाद वर्ष 1996 से उन्होंने अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। जनविश्वास और लोकप्रियता का ही परिणाम था कि वे लगातार चार बार सांसद निर्वाचित हुए। निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षण के कारण उनका यह संसदीय सफर आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन जनता के दिलों में उनके प्रति सम्मान और विश्वास सदैव बना रहा।
बचदा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ऊंचे राजनीतिक पदों पर पहुंचने के बावजूद उनका पहाड़ीपन, सहजता और अपनापन कभी उनसे अलग नहीं हुआ। उनकी वाणी में मिठास, व्यवहार में विनम्रता और व्यक्तित्व में ऐसी आत्मीयता थी कि उनसे पहली बार मिलने वाला व्यक्ति भी उनसे गहरा जुड़ाव महसूस करने लगता था। वे स्वच्छ राजनीति, ईमानदार मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने वाले नेता थे।
अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी और कृष्ण चंद्र पंत जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच भी बच्ची सिंह रावत का विशेष सम्मान था। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूंजी उनकी सादगी, सरलता और आत्मीय व्यवहार था। अटल जी भी उनके स्वभाव से प्रभावित थे। उनके व्यक्तित्व में हिमालयी क्षेत्र की प्रकृति, संस्कृति और संस्कारों की झलक दिखाई देती थी।
बचदा राजनीतिक विरोधियों के प्रति भी सदैव सम्मान का भाव रखते थे। उनका मानना था कि राजनीतिक विचारधाराएं और काम करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन पहाड़ के लोगों की मूल समस्याएं सबकी साझा जिम्मेदारी हैं। सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे विषयों पर सभी को मिलकर काम करना चाहिए। यही लोकतांत्रिक उदारता उन्हें दूसरे नेताओं से अलग पहचान देती थी।
उत्तराखंड के संघर्षपूर्ण परिवेश से निकलकर सफलता के शिखर तक पहुंचने वाले उद्यमी नरेंद्र सिंह लड़वाल के अनुसार, बचदा से पहली मुलाकात की मधुर स्मृतियां आज भी उनके मन में जीवंत हैं। उन्हें गर्व है कि ईश्वर ने ऐसे महान व्यक्तित्व के साथ उनका पारिवारिक रिश्ता जोड़ा।
बचदा की सहजता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनसे मिलने के लिए औपचारिकताओं और दिखावे की आवश्यकता महसूस नहीं होती थी।
वे लोगों से सीधे संवाद करते, उनकी समस्याएं सुनते और आत्मीयता के साथ उनका समाधान तलाशने का प्रयास करते थे। उनके व्यक्तित्व में पद का अहंकार नहीं, बल्कि जनसेवा का भाव दिखाई देता था। यही कारण था कि वे लोगों के बीच केवल एक जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह स्वीकार किए जाते थे।
रक्षा राज्य मंत्री के रूप में भी बचदा ने राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और युवाशक्ति पर विशेष जोर दिया। उनका विश्वास था कि भारतीय सेना को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है, जिनमें शारीरिक सामर्थ्य के साथ राष्ट्र के लिए समर्पण और त्याग की भावना हो। युवाओं को स्वास्थ्य, अनुशासन और समय के महत्व के प्रति जागरूक करने पर वे विशेष बल देते थे।
उनके कुछ विचारों की राजनीतिक स्तर पर आलोचना भी हुई, लेकिन वे अपने सिद्धांतों और विचारों को स्पष्टता से रखने में कभी पीछे नहीं हटे। वे मानते थे कि राष्ट्रसेवा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि चरित्र, अनुशासन और कर्म से सिद्ध होती है।
उत्तराखंड राज्य निर्माण के प्रश्न पर बच्ची सिंह रावत का रुख स्पष्ट और दृढ़ था। वे राज्य आंदोलन के अग्रणी समर्थकों में शामिल थे। उन्होंने राज्य की मांग को लेकर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए यहां तक कहा था कि यदि राज्य गठन की घोषणा शीघ्र नहीं की गई, तो वे सांसद पद छोड़कर आंदोलन में शामिल होने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
यह वक्तव्य उनके पहाड़, पहाड़ के लोगों और उनकी आकांक्षाओं के प्रति समर्पण को दर्शाता है। वे उत्तराखंड की भौगोलिक विषमताओं, दुर्गम गांवों, सीमित संसाधनों और संघर्षपूर्ण जनजीवन की समस्याओं को हर मंच पर उठाते रहे। उनका प्रयास था कि विकास की मुख्यधारा से दूर रह गए पर्वतीय क्षेत्रों को भी सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलें।
बचदा हिमालयी समाज की राष्ट्रभक्ति और त्याग की भावना को विशेष महत्व देते थे। उनका मानना था कि सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले पहाड़ के लोग देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय चेतना के सजग प्रहरी हैं। जब देश का बड़ा हिस्सा विश्राम कर रहा होता है, तब भी सीमांत क्षेत्रों के लोग कठिन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।
उनकी दृष्टि में उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण भूभाग नहीं था, बल्कि यह त्याग, तपस्या, परिश्रम, सैन्य परंपरा और राष्ट्रभक्ति की जीवंत भूमि थी। पहाड़ के लोगों के प्रति उनका सम्मान उनके भाषणों में ही नहीं, बल्कि उनके व्यवहार और कार्यशैली में भी दिखाई देता था।
आज जब राजनीति में सिद्धांतों, शालीनता और सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं पर निरंतर चर्चा होती है, तब बच्ची सिंह रावत जैसे जननेताओं का स्मरण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि आज के जनप्रतिनिधि उनकी तरह जनसेवा को सर्वोपरि रखें, विरोधियों के प्रति सम्मान बनाए रखें और पहाड़ की वास्तविक समस्याओं को अपनी राजनीति के केंद्र में रखें, तो उत्तराखंड के विकास को नई दिशा मिल सकती है।
बचदा का जीवन हमें सिखाता है कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना, उसकी पीड़ा समझना और उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है।
बचदा भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनकी सादगी और उनकी जनसेवा की विरासत आज भी जीवित है। उनका व्यक्तित्व उत्तराखंड की राजनीतिक स्मृतियों में सदैव सम्मान के साथ याद किया जाता रहेगा। ऐसे सरल, सहज, सिद्धांतनिष्ठ और जनप्रिय व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेते हैं।
स्वर्गीय बच्ची सिंह रावत ‘बचदा’ को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत्-शत् नमन।
(लोहाघाट से वरिष्ठ पत्रकार गणेश दत्त पांडेय की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ✍️)











