
नैनीताल, प्रेस 15 न्यूज। तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है…इन पंक्तियों में उत्तराखंड के गांव पहाड़ के हालातों को समझा जा सकता है।
नैनीताल से लगे गांव के लोग बीमार बुजुर्गों को आज भी 4 किलोमीटर पैदल दांडी (डोली) में ले जाने को मजबूर हैं। पिछले दिनों पंचायती चुनाव के बहिष्कार की राह चल रहे ग्रामीणों का सड़क नहीं होना एक बहुत बड़ा दर्द है। बीमारों को दांडी में जंगलों के रास्ते ले जाने के कुछ वीडियो शायद आपको दर्द का एहसास कराए।

नैनीताल जैसे वीवीआईपी जिले में कुर्सी में काबिज होने को अपने गृह जनपद से लेकर दिल्ली और देहरादून में बैठे माननीयों से जुगाड़ लगाने वाले जिला प्रशासन के अधिकारियों की बीते सालों में कभी कमी नहीं रही।
कमी रही तो इस बात की कि कोई अधिकारी ऐसा आए जो मीडिया में छाने के बजाय जमीन पर असल उत्तराखंड के लिए काम करे। कोई सरकारी बंगलों में ऐशोआराम से रहने वाले अधिकारियों को बताए कि असल उत्तराखंड गांव पहाड़ में भी बसता है।
नैनीताल से महज़ 9 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित बल्दीयाखान से लगभग 4 किलोमीटर दूर पगडण्डी के रास्ते पैदल ही बेलुवाखान ग्रामसभा के सौलिया, कूड़, होली, कुलबखा आदि दर्जनभर गाँव पहुंचा जा सकता है।
मोटर मार्ग नहीं होने के कारण इन गांवों के लोगों को पतली पगडण्डी मार्ग से ही पैदल आवाजाही करनी पड़ती है। ये तब और भी मुश्किल हो जाता है जब, बीमार बुजुर्ग या गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाना होता है, बच्चों को स्कूल जाना होता है, फल, सब्जी, दूध आदि को समय से मंडी पहुंचाना होता है या तत्काल कुछ सामान लाना होता है।
ग्रामीण पतली सी उबड़ खाबड़ पखडण्डी से मरीज को नदी नाले पार कराकर बमुश्किल मोटर मार्ग तक पहुंचाते हैं। एक मुश्किल ये भी है कि, पतली पगडण्डी होने के कारण इनकी दांडी भी एक एक व्यक्ति के लायक ही बनी है, जिससे ये कंधों पर बहुत भारी पड़ती है। मरीजों को लाना और ले जाना अपने आप में एक चुनौती से कम नहीं है।
विकास से कोसों दूर इन गांव में विद्युत आपूर्ति तो है लेकिन अपनी मर्जी की है। पेयजल का भी कमोवेश वही हाल है, हालांकि ग्रामीणों के पास प्राकृतिक श्रोत भी हैं। ग्रामीण इस मांग को कई वर्षों से उठा रहे हैं और उन्होंने सरकार को प्रत्यावेदन भी दिया है।
यहां के लोगों ने पिछले दिनों नेताओं और प्रशासन की अनदेखी और समस्याओं से त्रस्त होकर पंचायती चुनावों का बहिष्कार करने की ठानी थी। प्रेस 15 न्यूज ने ग्रामीणों के दर्द की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित भी की। जिसके बाद प्रशासन के अधिकारी गांव पहुंचे और ग्रामीणों को आश्वासन देकर चुनाव बहिष्कार वापस करवाया। आज आजादी के 78 वर्ष पूरे होने के बाद भी विश्वविख्यात नैनीताल से जुड़े गांव का ऐसा हाल देखकर विकास की बात करने वाले भारतीयों की आंखें शर्म से झुकनी चाहिए।
(नैनीताल से वरिष्ठ पत्रकार कमल जगाती की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट)
